Monday, August 13, 2012

नहीं चाहिए दीदी की दया


 ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति के लिए प्रणब मुखर्जी का नाम खारिज क्या किया। मानो प्रदेश कांग्रेस को उनसे छुटकारा पाने का एक अच्छा मौका ही हाथ लग गया। प्रदेश कांग्रेस के छोटे से लेकर बड़े तक सभी नेता उनकी तुलना मीर जाफर से करने लगे। लगे हाथों केंद्रीय नेतृत्व से मांग की जाने लगी कि उन्हें तृणमूल गठबंधन से बाहर आने की इजाजत दी जाये। कांग्रेस के बरहमपुर से सांसद अधीररंजन चौधरी ने तो ममता से नाता तोड़ लेने की सलाह दे डाली। हालांकि ममता मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मानसरंजन भुइयां जैसे एकाध लोग कुर्सी मोह से बंधे भी नजर आये। जाहिर है यदि ममता को केंद्र सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया जायेगा तो वह भी राज्य मंत्रिमंडल में शामिल कांग्रेस नेताओं को भी पैदल कर देंगी। मानसरंजन यह बात अच्छी तरह से जानते हैं।
बहरहाल राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम को खारिज करने पर गुस्से और सदमे से भरे पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेताओं ने तृणमूल अध्यक्ष की तुलना मीर जाफर से की । गौरतलब है कि 18वीं सदी में मीर जाफर की सिराजुद्दौला के साथ गद्दारी की वजह से ही बंगाल और आखिरकार पूरे देश पर अंग्रेजी कब्जे का रास्ता साफ हुआ था। प्रणव मुखर्जी के विरोध को बंगाली अस्मिता का सवाल बनाते हुए प्रदेश कांग्रेस ममता को घेरने में जुट गया है। हालांकि ममता भी जानती थी कि इसे बंगाली विरोध माना जा सकता है इसीलिए तो उन्होंने सोमनाथ चटर्जी का नाम आगे बढ़ाया था। बहरहाल नलहाटी से विधायक और प्रणब के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने मुख्यमंत्री के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने साथ ही कहा कि इस मौके पर वे और कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि इससे उनकी (प्रणब की) संभावनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है।
बहरामपुर के दिग्गज कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने कहा कि यह बंगाल के इतिहास का काला दिन है। यह 1996 (जब माकपा की केंद्रीय समिति ने प्रधानमंत्री पद के लिए ज्योति बसु के नाम को मंजूरी से इनकार कर दिया था) की पुनरावृत्ति है। ममता की तुलना अब सिर्फ मीर जाफर से ही हो सकती है। उन्होंने बंगालियों को धोखा दिया है और अब वे बंगाल के माथे पर दाग बन चुकी हैं।
प्रणब मुखर्जी की दावेदारी के समर्थन के लिए ममता से सार्वजनिक अपील कर चुके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि मुख्यमंत्री का यह कदम व्यक्तिगत खुन्नस में उठाया गया प्रतीत होता है। लेकिन इससे बंगालियों की भावनाएं आहत हुई हैं और ममता को इसकी कीमत चुकानी होगी। ममता को लगता है कि पश्चिम बंगाल को आर्थिक संकट से उबारने के लिए राहत पैकेज देने में प्रणब टालमटोल कर रहे हैं और वे कई बार इस पर अपनी झुंझलाहट का इजहार कर चुकी हैं। इस साल के शुरू में उन्होंने तृणमूल संसदीय की बैठक में रेल भाड़ा बढ़ाने के पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के प्रस्ताव को प्रणब मुखर्जी की 'करामातÓ बताया था।
पश्चिम बंगाल कांग्रेस विधायक दल ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का ममता बनर्जी द्वारा अनौपचारिक ढंग से विरोध किए जाने के बाद कहा कि अब तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करना बहुत कठिन हो गया है। राज्य के कांग्रेस विधायक दल ने पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर सत्तारूढ़ गठबंधन छोडऩे की अनुमति मांगी है। कांग्रेस विधायक दल के नेता मुहम्मद सोहराब ने कहा, कि हमने देखा है कि ममता बनर्जी ने किस तरह अनौपचारिक ढंग से मुखर्जी की उम्मीदवारी से खुद को अलग कर लिया। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस के साथ राज्य सरकार का एक हिस्सा बनकर रहना हमारे लिए सहज नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने यहां कहा, हमारे विधायक उनके साथ सहज रूप से काम नहीं कर पाएंगे। हाल के राजनीतिक परिदृश्य ने हमारे लिए गठबंधन में बने रहना बहुत मुश्किल कर दिया है। हम पार्टी आलाकमान से अनुरोध करते हैं कि वह इस बारे में फैसला ले।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जो अब तक तृणमूल कांग्रेस का विरोध करने से हिचकती रही है, अब सदन में जोरदार ढंग से उसका विरोध करेगी।
गौरतलब है कि ममता ने शुरुआत में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित किया था, जिस कारण उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
भट्टाचार्य ने कहा, हम मुख्यमंत्री (ममता) के अनैतिक व्यवहार की कड़ी निंदा करते हैं। वह एक तरफ लोकतंत्र के संघीय ढांचे की वकालत करती हैं और दूसरी ओर अपेक्षा रखती हैं कि केंद्र सरकार इसको नजरअंदाज कर दे और अर्थसंकट झेल रहे बंगाल को वित्तीय सहायता दे।
 पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ संबंधों में आए तनाव के बाद कांग्रेस ने कहा है कि राज्य में ममता बनर्जी की सरकार में उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही है और पार्टी को अपने बूते आगे बढऩे का अधिकार है।
प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया, 127 साल पुरानी पार्टी को अपने बूते आगे बढऩे का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कैबिनेट में हम इतने कम हैं कि हमारी आवाज नहीं सुनी जाती है।
कांग्रेस ने एएमआरआई अस्पताल अग्निकांड के बाद की स्थिति, गोरखालैंड मांग और नक्सल प्रभावित जंगलमहल में समस्याओं सहित कई मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया। भट्टाचार्य ने कहा कि वस्तुत: यह तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस सरकार का एक छोटा सा हिस्सा है। बुनियादी नीति और अन्य फैसले तृणमूल कांग्रेस लेती है और इसे तृणमूल कांग्रेस ही लागू करती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच किसी तनाव से गठबंधन पर असर नहीं पड़ेगा।
बद्रीनाथ वर्मा

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