Monday, August 13, 2012

बीजेपी से बिदक रहे बाबा


एजेंडा

बीजेपी से बिदक रहे बाबा ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका 'इतवार' में प्रकाशित )

इंट्रो : मुस्लिमों व दलित इसाइयों को आरक्षण देने की वकालत कर बाबा रामदेव ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। उनके इस बयान के गहरे मायने हैं
 हाईलाइटर :
क्या बाबा रामदेव बीजेपी से पिंड छुड़ा रहे हैं। यह सवाल इन दिनों बड़े जोर शोर से उठाया जा रहा है। यह सवाल इसलिए उछाला जा रहा है कि हाल फिलहाल उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित मुसलमानों की एक सभा में खुद को सबसे बड़ा मुस्लिम पैरोकार घोषित किया। बीजेपी व आरएसएस की नीतियों से उलट उन्होंने मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग का समर्थन ही नहीं किया बल्कि संविधान में संशोधन की भी मांग कर डाली। हालांकि, अभी तक बाबा बीजेपी के ही सुर में सुर मिलाकर बोल रहे थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तराखंड में बीजेपी को वोट देने की अपील भी की थी। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि बाबा बीजेपी से कन्नी काट रहे हैं। दरअसल, इस बहाने बाबा रामदेव अपना आधार बढ़ाना चाह रहे हैं। उन्हें एकमुश्त पडऩे वाले मुस्लिम वोटों के रूप में लहलहाती फसल लुभा रही है। वह इसे आगामी चुनाव में काटना चाहते हैं। यही कारण है कि उनके सुर बीजेपी से अलग सुनाई दे रहे हैं। उनकी इस उलटबांसी को इस रूप में भी कहा जा सकता है कि वह भी राजनीतिज्ञों की भाषा बोलना सीख गये हैं। कब, कहां क्या और कितना बोलना है। इसका बखूबी अंदाजा उन्हें हो गया है। उस कार्यक्रम में शिरकत करते हुए बाबा रामदेव ने जो कुछ कहा उससे तो यही आभास हो रहा है कि वह बीजेपी से बिदकने लगे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ उनकी चाल बता रहे हैं। वह मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग कर खुद को बीजेपी व आरएसएस से अलग दिखाना चाहते हैं। इसमें वह कितना कामयाब होते हैं यह तो समय ही बतायेगा। परन्तु राजनीतिक पंडितों का कहना है कि दो नाव पर सवारी करने की सोच रहे बाबा कहीं बीच भंवर में डूब ही न जाये। यानी मुसलमान वोटों की चाह में कहीं उनके समर्थक ही न बिदक जायें। और वही हाल हो कि न खुदा ही मिला न विशाले सनम।
 कांग्रेस के स्वनामधन्य महासचिव दिग्गीराजा उर्फ दिग्विजय सिंह योगगुरु पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह आरएसएस के एजेंडे पर काम कर रहे हैं।
चूंकि काले धन के मुद्दे पर आंदोलन छेडऩे वाले बाबा भी भारत स्वाभिमान मंच के नाम से संगठन बनाकर राजनीतिक रण में कूद चुके हैं और उन्हें भी वोटों की फसल काटनी है। इसलिए मुस्लिम वोटों की चाह में वे खुद को बीजेपी व आरएसएस से अलग साबित करने में जी जान से जुटे हैं। रामदेव को जानने वालों का दावा है कि भीड़ देखकर बहक जायें इतने कच्चे नहीं हैं वह। उनकी हर बात सोची समझी होती है। दरअसल, वह अपनी छवि हिंदू संत से बदलकर सर्वमान्य बनाना चाहते हंै। अभी तक उनकी छवि हिंदुत्व वाली रही है। हालांकि उन्होंने आरएसएस या बजरंग दल की तरह कट्टर हिंदुवाद की बात कभी नहीं की। किंतु भगवा चोला धारी व साध्वी ऋतंभरा आदि के साथ घनिष्ठता की वजह से उन पर यह आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस तो बार बार उन पर आरएसएस की गोद में खेलने का आरोप लगाती रही है। पिछले साल दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव के अनशन स्थल पर साध्वी ऋतंभरा की मौजूदगी को आधार बनाकर कांग्रेस की ओर से दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहराया गया था। गौरतलब है कि अनशनस्थल से बाबा को महिलाओं के कपड़े पहनकर वहां से भागना पड़ा था। इस पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे जान से मार देने की साजिश की गई थी। इसलिए मुझे महिलाओं के कपड़े पहनकर जान बचानी पड़ी। बहरहाल उस घटना के बाद अपनी साख गंवा बैठे बाबा रामदेव एक बार फिर पूरे दमखम के साथ ताल ठोंक रहे हैं। और कांग्रेस को गरियाने का एक भी मौका नहीं चूकते हैं। अभी पिछले दिनों ही उन्होंने सांसदों पर हमला बोलते हुए कह दिया था कि पूरी संसद बीमार है। इस पर बावेला मचना ही था। सो मचा भी। लालू प्रसाद यादव समेत कई अन्य सांसदों ने बाबा को मानसिक रोगी करार दिया। लालू ने तो अपने ठेठ अंदाज में यहां तक कह दिया कि बाबा पगलेटई करने लगे हैं। जानकारों का मानना है कि बाबा के ये बयान मीडिया की सुर्खियों में बने रहने का उनका फंडा है। वे अक्सर काले धन को लेकर कांग्रेस पर आक्रामक होते रहे हैं। रामलीला मैदान वाली घटना के बाद तो वह पूरी तरह से कांग्रेस को काट खाने को तैयार रहते हैं। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि आने वाले चुनाव में वह देश के सभी लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। इसके लिए भारत स्वाभिमान के बैनर तले वह कालाधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण के क्रम में देश भ्रमण पर हैं। उनका मुसलमानों के आरक्षण की वकालत करना आरएसएस से खुद को अलग दिखाने की सोची समझी रणनीति है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक के एजेंडे पर काम करने के लगने वाले आरोपों का तोड़ उन्होंने इस रूप में निकाला है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धर्म के आधार पर आरक्षण की खिलाफत करता रहा है। जबकि योगगुरु ने मुस्लिमों के साथ दलित ईसाइयों को भी आरक्षण देने की वकालत कर ठीक उसके उलट काम किया है।
 बाबा रामदेव को जानने वालों का दावा है कि बाबा कोई भी काम बगैर सोचे समझे नहीं करते। हर बात को बोलने से पहले उसके लाभ हानि का गुणा भाग कर लेते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय राजधानी में उनके दिये गये इस बयान के बड़े गहरे अर्थ हैं। एक तो इससे उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर काम करने के आरोप से छुटकारा मिल जायेगा और दूसरा यह कि लगे हाथ एकमुश्त मुस्लिम वोटों पर दावेदारी भी तय हो जायेगी। दरअसल योगगुरु मुसलमानों व इसाइयों के सबसे बड़े खैरख्वाह का तमगा हासिल करना चाहते हैं। इसीलिये इस तरह के विवादित बयान दे रहे हैं। वैसे तो विवादित बयान देने में योगगुरु का कोई सानी नहीं है। बहरहाल स्वामी रामदेव से मौलाना रामदेव बनने की ओर उन्होंने कदम बढ़ा कर जहां मुस्लिम वोटों पर अपनी दावेदारी जताई है, वहीं बीजेपी को भी संकेत दे दिया है कि अब वह अपनी राह अलग बनायेंगे। हालांकि कुछ लोगों की राय में बाबा बहक रहे हैं। यदि समय रहते वे सचेत नहीं हुए तो उनका हश्र भी वही होगा, जो उनके पूर्ववर्ती संतों की राजनीतिक पार्टियों का हुआ। चाहे वह महेश योगी रहे हों या फिर जय गुरुदेव। इन बाबाओं के भी कम अनुयायी नहीं थे। महेश योगी ने जहां भगवान राम के नाम की मुद्रा चला दी, वहीं जय गुरुदेव ने अपने करोड़ों अनुयायियों को टाट का वस्त्र ही पहना दिया। बावजूद इसके ये बाबा लोग राजनीति के मैदान पर फिसड्डी ही साबित हुए।
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन से खुद को अलग दिखाने के फेर में स्वामी रामदेव मुस्लिम आरक्षण की वकालत की हो। किंतु इससे उनके समर्थक बिदक सकते हैं। एक तरफ जहां आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को आरक्षण देने की बात की जा रही है ऐसे में बाबा का धर्म के आधार पर आरक्षण की वकालत करना उनके लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
 दरअसल, बाबा रामदेव ने मुस्लिम समुदाय से जुडऩे की अब तक की सबसे बड़ी पहल करते हुए दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में मुस्लिम नेताओं के साथ मंच साझा किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि वो अपनी अगली रैलियों में मुस्लिमों के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाएंगे। रामदेव ने कहा, यदि तुम्हारे मौलाना तुम्हारी आवाज नहीं उठा सकते तो ये बाबा तुम्हारी आवाज उठाएगा। कांफ्रेंस में बोलते हुए रामदेव ने अनुसूचित जातियों के आरक्षण में पिछड़े मुस्लमानों को भी हिस्सा देने की वकालत की। रामदेव ने यह भी कहा कि वह सरकार में मुसलमानों की ज्यादा भागीदारी की भी मांग करेंगे। इस मौके पर रामदेव ने मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए संविधान में संशोधन की मांग का समर्थन भी किया। उन्होंने कहा कि धारा 341 का मामला केवल किसी एक समुदाय का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश का मामला है। ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा की तरफ से बुलाये गये इस खास सम्मेलन को नाम दिया गया था मुसलमानों के बीच बाबा रामदेव।
रामदेव ने कहा, लोग कहते हैं कि मैं योग गुरु हूं, भगवा चोला पहनता हूं और मुसलमानों के मुद्दों में यकीन नहीं रखता, जो ऐसा कहते हैं वो पतंजलि योगपीठ आकर देखें, वहां तीन हजार मुस्लिम युवा काम करते हैं। वहां हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं है। वहां कोई धर्म नहीं है, कोई पार्टी नहीं और ना ही कोई मंदिर या मस्जिद।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों के विषय में बात करने वाला संविधान का अनुच्छेद 341 मुस्लिम और ईसाई दलितों की बात नहीं करता है। यह अन्याय है और इसमें बदलाव होना चाहिए। सभी दलितों के बराबर हक होने चाहिए। इसके लिए संघर्ष करने वालों के साथ मैं भी दिल से साथ हूं। योग गुरु ने कहा कि वे अपने आंदोलन में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। यही वजह है कि चार जून को दिल्ली में होने वाले अनशन के दौरान उर्दू में भी पोस्टर बैनर लगाए जाएंगे।
हम अपने मुसलमान भाईयों और बहनों के साथ हैं. मेरे आश्रम में तीन हज़ार मुसलमान हैं. वहां कोई धर्म नहीं है, कोई पार्टी नहीं और ना ही कोई मंदिर या मस्जिद। मुसलमानों के मूल अधिकारों के बारे में ध्यान ना देने पर सरकार की आलोचना करते हुए रामदेव ने कहा कि अल्पसंख्यकों के प्रति उनका जज्बा नया नहीं है। बाबा के इस बयान को बीजेपी से कन्नी काटने के रूप में देखा जा रहा है। सम्मेलन में बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं के साथ बाबा रामदेव को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। इस मौके पर बाबा रामदेव ने एलान किया कि अब वह मुसलमानों की आरक्षण की लड़ाई भी लड़ेंगे। रामदेव ने कहा मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 341 में संशोधन जरूरी है। अपने लंबे चौड़े भाषण के अंत में बाबा रामदेव ने मुसलमानों को देश भक्ति का पाठ भी पढ़ाया और कहा कि अब नफरत की दीवार गिराने का वक्त आ गया है।
वैसे एक सच्चाई यह भी है कि विधानसभा चुनाव में रामदेव ने उत्तराखंड में बीजेपी को वोट देने की अपील की थी किंतु उनकी यह अपील किसी काम न आई। बीजेपी को वहां हार का मुंह देखना पड़ा। ऐसे में कहा जा रहा है कि बाबा के योग शिविरों में भले ही हजारों की भीड़ उमड़ती है लेकिन यह वोट में तब्दील होगी यह दावा नहीं किया जा सकता।
  बद्रीनाथ वर्मा

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