Saturday, January 29, 2022

हक व न्याय के लिए 126 दिवसीय तिरंगा यात्रा शुरू



मांगें नहीं माने जाने की स्थिति में उग्र आंदोलन की धमकी

नर्मदा। देश आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहा है लेकिन आदिवासी समुदाया आज भी विकास की दौड़ में काफी पीछे हैं। सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने  73वें गणतंत्र दिवस पर गुजरात के नर्मदा जिला के आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण के लिए साचो आदिवासी तीरंगा यात्रा शुरू की गई है। भरुच जिला के झगड़ीया मत विस्तार के आदिवासी मसीहा के नाम से प्रख्यात छोटुभाई वसावा एवं नर्मदा जिला के डेडीयापाड़ा सागबारा मत विस्तार के लोकप्रिय विधायक महेशभाई वसावा ने गुजरात सरकार, केन्द्र सरकार व तमाम पार्टियों से अपील कि है कि आदिवासीयो के हक व न्याय के लिए साच्चो आदिवासी तिरंगा यात्रा में शामिल होकर आदिवासियों को न्याय दिलाएं। यह यात्रा किसी पार्टी प्रेरित नहीं है बल्कि समाज के आदिवासी गरीब वर्गों को न्याय दिलाने की यात्रा है। यह यात्रा डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान के अनुरूप आदिवासी अपना हक चाहते हैं। किसी से भीख नही मांगते। उन्होंने कहा कि यदि हमारी मांग पर किसी ने संज्ञान नहीं लिया तो समस्त आदिवासी समाजअपने हक के लिये उग्र आंदोलन करेगा।

उन्होंने आदिवासियों की मांगों का उल्लेख करते हुए कहा कि तापी और नर्मदा का पानी हमारे क्षेत्र से गुजरात के स्वराष्ट्र में जाता है लेकिन आदिवासी क्षेत्र से निकलने वाले नहर के पानी से अगल-बगल के आदिवासी किसानों को वंचित रखा जाता है। गुजरात में दारूबंदी का हम समर्थन करते हैं लेकिन नकली दारू पीकर आदिवासी मर रहे हैं और औरतें विधवा व बच्चे अनाथ हो रहे हैं। क्या सरकार ने कभी इसके बारे में सोचा कि ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल, दारुबंदी के बावजूद प्रशासन व गुजरात पुलिस की शह पर हरेक गांव व तालुका में नकली दारू खुलेआम बिक रहा है। नकली दारू आदिवासीयों को शारीरिक-मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर रही है। नकली दारू पीकर लोगों की असमय मृत्यु हो रही है। आदिवासि युवाओं के खिलाफ यह एक गहरा षड्यंत्र है। अगर गुजरात सरकार ने इसका संज्ञान नहीं लिया तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। पूरे देश में 16 से 17 करोड़ और अकेले गुजरात में ही एक से डेढ़ करोड़ आदिवासी हैं।



बहरहाल, 73वें गणतंत्र दिवस से शुरू साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा 126 दिनों तक गुजरात के समस्त आदिकासी क्षेत्रों में गुजरते हुए निकलेगी जिसका नेतृत्व झगड़ीया मत विस्तार के विधायक छोटुभाई वसावा व डेडीयापाडा-सागबारा के लोकप्रिय विधायक महेशभाई बसावा के नेतृत्व एवं मुख्य सलाहकार डॉ. के. मोहन आर्य बीटीटीएस प्रमुख महेश जी बसावा तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष परेश बसावा कर रहे हैं। इस यात्रा में  पूर्व नर्मदा जिला कारोबारी अध्यक्ष बहादुरभाई वसावा, युवा सरपंच देवजीभाई वसावा नर्मदा जिला के उप प्रमुख जगदीश भाई वसावा (जगो) बीटीबी के अग्रणी कार्यकर्ता सागर के आर्य समेत हजारों कार्यकर्ता शामिल हैं। तिरंगा यात्रा में शामिल लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर उचित विचार नहीं किया तो फिर उग्र आंदोलन किया जाएगा। साथ ही गुजरात विधान सभा के समक्ष 5 से 6 लाख आदिवासी धरना पर बैठकर विधानसभा का घेराव करेंगे। अब यह लड़ाई साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा के बैनर तले मरते दम तक जारी रहेगा।

Saturday, May 28, 2016

जिंदगी में मिठास घोलते सागर के दो बूंद


बद्रीनाथ वर्मा
133 ए, गली नंबर 21 बिपिन गार्डेन एक्सटेंशन निकट द्वारका मोड़ दिल्ली। यह एक महज पता नहीं है। बल्कि यह ऐसा पता है जहां आकर हर ओर से हारे थके लोगों को जीने की एक नई उम्मीद मिलती है। यहां रहते हैं सागर। इनकी दो बूंद की सलाह अब तक सैकड़ों जिंदगियों को रौशन कर चुकी है। जूनून की हद तक जनसेवा को अपना ध्येय मानने वाले सागर यूं तो शिक्षा मंत्रालय में कार्यरत हैं मगर उनकी इससे एक अलग पहचान भी है। वह पहचान है लाइलाज बीमारियों से लोगों को निजात दिलाने की। होम्योपैथिक औषधियों से असाध्य बीमारियों से पीड़ित लोगों को नवजीवन प्रदान करने वाले सागर का बचपन बिहार के मधेपुरा जिले के सिंहेश्वर में बीता है। स्कूली शिक्षा भी उन्होंने यहीं से पाई है। ज्ञात हो कि सिंहेश्वर सबसे बड़े महादेव मंदिर के लिए देश भर में ख्यात है। पिता से विरासत में मिले होम्योपैथी ज्ञान को उन्होंने स्वाध्याय व व्यापक रिसर्च के सहारे कई सारे ऐसे केसों में जहां बड़े बड़े अस्पतालों व डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे ऐसे लोगों को भी उन्होंने नवजीवन प्रदान किया है। सागर के पास होम्योपैथी या किसी भी मेडिकल पद्धति की कोई डिग्री नहीं है लेकिन स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान के बलबूते निस्पृह भाव से मानव समाज की भलाई के लिए कार्य किये जा रहे हैं। सरकारी नौकरी में होने की वजह से वैसे तो दवा देने से कतराते हैं लेकिन रोग से पीड़ित लोगों की व्यथा से विचलित होकर अंतत: उनका इलाज करने को राजी हो जाते हैं। हालांकि सागर काफी व्यस्त रहते हैं बावजूद इसके चूंकि शनिवार व रविवार को दफ्तर में छुट्टी रहती है सो उस दिन उनके आवास पर दूर दूर से लोग उनके हाथों से दवाइयों की दो बूंद लेने आते हैं। सागर के इलाज से लाभान्वित हुए लोग एक सुर में बताते हैं कि उनके हाथों में जादू है। रोगों को डायग्नोस कर दवाओं का कंपोजिशन वे खुद तैयार करते हैं। जब कोई हर ओर से हारा थका एक उम्मीद लेकर उनके यहां आता है तो वे अपनी पूरी ऊर्जा उसे रोगमुक्त करने में लगा देते हैं। उनकी इसी जूनून का नतीजा है कि जिन रोगों को बड़े बड़े डाक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था वह इन्होंने अपनी दो बूंदों की बदौलत ठीक कर दिया। उनकी सलाह पर होम्योपैथी की दो बूंद लेकर आज सैकड़ों लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारियों से मुक्त होकर खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। सागर के विभाग के सेक्शन आॅफिसर संतोष का चार वर्षीय बेटा सुगर से पीड़ित था। इंसुलिन उसके जीवन के रोजमर्रा का हिस्सा हो गया था। संतोष के मुताबिक जबसे सागर ने उसका इलाज शुरू किया है तबसे उनके बेटे के सुगर लेबल में सुधार की प्रक्रिया शुरू है। उन्हें विश्वास हो गया है कि जल्द ही उनका बेटा पूरी तरह से ठीक हो जाएगा और उसे इंसुलिन की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी तरह उनकी सहकर्मी रश्मि बताती हैं कि उनकी बेटी दो-दो तीन-तीन दिन तक लैट्रिन नहीं जा पाती थी लेकिन सागर की दवा से उसे इस परेशानी से मुक्ति मिल गई है। सागर की  दो बूंद की सलाह से नवजीवन पाए ऐसे सैकड़ों लोगों की अपनी अपनी कहानियां हैं। निरोग हो चुके ऐसे लोग उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। 

Monday, December 7, 2015

आओ असहिष्णुता-असहिष्णुता खेलें

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
इन दिनों देश के सबसे प्रिय खेल का नाम ‘असहिष्णुता’ है। जिसे देखो वही असहिष्णुता-असहिष्णुता का खेल खेलने में मस्त है। यह असहिष्णुता न होकर मानो लुकाछिपी का खेल हो गया हो। मीडिया की सुर्खियां बटोरने का सबसे सहज तरीका बन चुके इस खेल को हर कोई अपने-अपने तरीके से खेल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल से शुरू हुआ एवार्ड वापसी आंदोलन बिहार चुनाव के बाद मंद पड़ चुका है। साल 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिखों के कत्लेआम के दो वर्ष बाद सन् 1986 में नयनतारा सहगल को पद्मश्री अवार्ड मिला था। क्या सहगल इसका जवाब देना चाहेंगी कि दिल्ली में निरपराध सिखों के गले में टायर डालकर जिंदा जला देने की घटना सहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। जिन राजीव गांधी की सरकार ने उन्हें यह पुरस्कार दिया था उन्हीं राजीव गांधी ने इस कत्लेआम पर टिप्पणी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती डोलती है। दरअसल, यह सब मोदी सरकार को देश दुनिया  में बदनाम करने की गहरी साजिश का एक हिस्सा है। भाजपा व उसके सहयोगियों का भी मानना है कि यह राजनीतिक फायदे के लिए की गई प्रायोजित साजिश थी। असहिष्णुता के नाम पर अरण्य रोदन कर रहे सहिष्णुता के पुजारियों का कलेजा दिल्ली में 3 दिन के अंदर छह हजार सिक्खों के मारे जाने पर क्यों नहीं फटा! क्यों नहीं उनका कलेजा लाखों कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम पर फटा! क्या गोधरा में 59 रामसेवकों के जिन्दा जलाए जाने की घटना सहिष्णुता की परिधि में आती है! दर्जनों ऐसे वाकये हैं। क्या-क्या लिखें...? जयचन्द भी सहिष्णुता के इन पुजारियों के दोहरे मापदंड से शर्मिंंदा होकर कहीं सिर झुकाये आंसू बहा रहा होगा! असहिष्णुता का एहसास मुंबई बम ब्लास्ट, भारतीय संसद पर हमले, बैंगलुरू बम ब्लास्ट और 26-11 इत्यादि के समय भी नहीं हुआ। आखिर क्यों? हत्या चाहे अखलाक की हो या फिर कैप्टन संतोष महादिक की। हत्या तो हत्या है। मगर विडंबना देखिए कि इसे भी राजनीतिक नफे-नुकसान के चश्मे से देखा जाता है। दोहरा मापदंड अपनाने वाले हमारे राजनेताओं से लेकर मीडिया के मठाधीशों की आत्मा को चुनिंदा मामले ही झकझोरते हैं। दादरी कांड को लेकर आसमान सिर पर उठाने वालों के पास कश्मीर में आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक की संवेदना में बोलने को दो शब्द तक नहीं हैं। दादरी में लगभग सभी दलों के नेताओं ने सिजदा किया, लेकिन देश के लिए शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक को अंतिम विदाई देने के लिए रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के अतिरिक्त एक भी सियासतदां नहीं पहुंचा।    
बहरहाल, असहिष्णुता का खेल खेलकर अभी शाहरूख खान निपटे ही थे कि बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान ने एंट्री मार दी। उनकी पत्नी किरण को पिछले छह महीनों में घटी कुछ घटनाओं की वजह से अब इस देश में डर लगने लगा है। वह अपने बच्चों के हित में किसी और देश में बसने के लिए आमिर पर दबाव बना रही हैं। आमिर के मुताबिक पिछले 6 महीनों में लोगों में डर और असुरक्षा की भावना बढ़ी है। देश का सामाजिक तानाबाना इस समय पूरी तरह ठीक नहीं है। इस तरह के माहौल को देखते हुए एक बार उनकी पत्नी किरण ने उनसे देश छोड़ने तक की बात कह दी थी। वह आसपास के माहौल से चिंतित थीं। रोजाना अखबार खोलते हुए भी उन्हें डर लगता है। बच्चों की फिक्र में पहली बार उन्होंने इतनी बड़ी बात कह दी थी। आमिर सही कह रहे हैं। मैं भी उनके स्वर में अपना स्वर मिलाता हूं क्योंकि अगर किसी हिन्दू बहुसंख्यक देश के तीन सबसे बड़े सुपरस्टार मुस्लिम हो सकते हैं तो यह अपने आप में साबित करता है कि देश के बहुसंख्यक वाकई असहिष्णु हैं। वैसे तथ्य यह भी है कि आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ अगले महीने सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। ऐसे में अधिकतर लोगों का मानना है कि आमिर का यह बयान फिल्म प्रमोशन का एक हिस्सा है। हालांकि उनके बयान के बाद तल्ख टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने आमिर को सबसे करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आमिर डर रहे हैं या दूसरों को डरा रहे हैं। आमिर पर तंज कसते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा, ‘दुनिया में भारत से अच्छा देश कोई और नहीं मिलेगा। भारत के मुस्लिमों के लिए हिंदुस्तान से अच्छा देश और हिंदुओं से अच्छा पड़ोसी नहीं मिलेगा। आज सीरिया, तुर्की, जॉर्डन, ईरान, इराक में क्या हालात हैं? हिंदुस्तान में पूरे अरब देशों से ज्यादा मुस्लिम हैं और उन्हें बराबर का हक मिला हुआ है। अपने मन में भ्रम मत रखो। कहां जाओगे। जहां जाइएगा असहिष्णुता पाइएगा। भारत में किसी की जाति और धर्म देखे बिना लोग कलाकारों को पसंद करते हैं।’ वहीं, अनुपम खेर ने आमिर खान से पूछा कि क्या आपने किरण से पूछा कि वह भारत छोड़कर किस देश में जाना चाहेंगी। क्या आपने उन्हें बताया कि यह वही देश है जिसने आपको आमिर खान बनाया है। साक्षी महाराज भी भला कहां चूकने वाले थे। उन्होंने भी दनादन सवाल दाग दिये। आमिर खान बताएं कि भारत अच्छा नहीं लगता है तो क्या उनको ईरान, इराक अच्छा लगता है? क्या उनको औरंगजेब का शासन अच्छा लगता है? क्या उन्हें तालिबानी देश अच्छा लगता है? बहरहाल, जो भी हो पीएम मोदी अभी भी बहुतों को हजम नहीं हो पा रहे हैं।

पिद्दी साबित हुए दिल्ली के सूरमा

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार के मतदाताओं ने जदयू, राजद और कांग्रेस के पक्ष में अपना जनादेश दे दिया। यह जनादेश करीब 19 माह पहले हुए लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलहदा साबित हुआ। कुछ महीनों के भीतर आये इस फैसले में कई संदेश छुपे हुए हैं। ये संदेश बिहार की राजनीति से लेकर केंद्रीय राजनीति से सरोकार रखने वाले हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भारत में एक नये राजनीतिक व्याकरण की रचना की है। तमाम आकलन और अनुमानों को धत्ता बताते हुए नीतीश कुमार नीत महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) ने चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले राजग को करारी शिकस्त दी है। एनडीए द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा प्रस्तुत नहीं करना, बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेताओं के मोदी विरोधी सुर, मोहन भागवत का आरक्षण वाला बयान, महंगाई की मार, गाय व बीफ की राजनीति जैसी अन्य कई बातें भाजपा को ले डूबी। भाजपा के लिए यह न भूलने वाला चुनाव होगा। 243 सदस्यीय सदन में 178 सीटें जीतकर महागठबंधन ने जहां अपना किला मजबूत किया, वहीं अपना सब कुछ दांव पर लगाकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ सिर्फ 58 सीटें लगीं। लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 31 सीटें जीतने वाले भाजपा गठबंधन को विधानसभा चुनाव में ‘महा-हार’ का सामना करना पड़ा। वहीं, लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों करारी शिकस्त का मलाल धोते हुए महागठबंधन ने आंखें चौंधिया देने वाला प्रदर्शन किया। समझा जा रहा है कि बिहार में आए चुनाव परिणामों से दिल्ली की राजनीति में भी व्यापक असर देखने को मिलेगा। जैसा कि लालू प्रसाद यादव ने कहा भी है कि नीतीश बिहार देखेंगे और वे देश। बेशक राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश व लालू का कद बढ़ेगा।
भाजपा को सबसे तगड़ा झटका उसके सहयोगियों की तरफ से मिला, जो 87 सीटों पर चुनाव लड़े और केवल पांच पर जीत दर्ज कर सके। भाजपा को उम्मीद थी कि वह राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा के जरिये दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वोटों में सेंध लगा पायेगी लेकिन ऐसा हो न सका। पासवान और आरएलएसपी को जहां दो-दो सीटें नसीब हुईं वहीं मांझी की पार्टी को तो सिर्फ एक ही जीत से संतोष करना पड़ा। पिछले वर्ष मई में लोकसभा चुनाव में प्रचंड वेग के साथ अपनी पार्टी का विजयरथ हांकने वाले मोदी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर में अकेले या गठबंधन सरकार बनाई। इस बात को ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस, राजद और जदयू का सूपड़ा साफ करके राज्य की 40 में से 31 सीटें जीती थीं। इस जीत ने राजनीति के एक कुटिल सिद्धांत कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, को सतह पर ला दिया और इन तीनों पराजित योद्धाओं ने मोदी के खिलाफ कमर कस ली। एक महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में तीनों दलों ने थोड़े संकोच के साथ हाथ मिलाया, लेकिन 10 में से 6 सीटों पर जीत ने तीनों पार्टियों को एक होने का हौंसला दिया और उसी का नतीजा था कि मोदी के सामने लोकसभा चुनाव में पिद्दी साबित हुई पार्टियां मोदी को ही बौना करने में कामयाब रहीं।
इस महाविजय के साथ बिहार की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने फिर से अपनी रणनीति का लोहा मनवा दिया है और भारी जीत दर्ज कर वह एक बार फिर से प्रदेश के चंद्रगुप्त बनने जा रहे हैं। नीतीश की यह लगातार तीसरी जीत है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इस सदियों पुरानी कहावत का अनुसरण करते हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की 40 सीटों में से मात्र दो सीटों पर जीत हासिल करने के बाद जनता दल यू नेता नीतीश कुमार ने अपने कट्टर दुश्मन नरेंद्र मोदी रूपी तूफान को रोकने के लिए लालू से गलबहियां डालीं। राज्य की राजनीति में दोस्त से दुश्मन और फिर दोस्त बने लालू और नीतीश ने अपने अपने मतभेदों को भूलाकर 40 साल पुराने छात्र आंदोलन के जमाने के गठबंधन को फिर से खड़ा किया। इसी छात्र आंदोलन की सीढ़ी पर चढ़कर 1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कूदे लालू की किस्मत रंग लायी और वह चुनाव जीत गए। लेकिन उनके साथी नीतीश कुमार को 1985 में राज्य विधानसभा चुनाव में पहली बार जीत हासिल करने में आठ साल लग गए। 1985 से पहले नीतीश दो बार चुनाव हार गए थे। नीतीश कुमार ने 1989 में बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए लालू का समर्थन किया। बारा से 1989 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले नीतीश कुमार ने अपनी नजरें राज्य की राजनीति से हटाकर अब दिल्ली पर केंद्रित कर दी थीं और वह 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में भी विजयी रहे। नीतीश ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री और 1999 में कुछ समय के लिए रेल मंत्री का पदभार संभाला। सौम्य  नीतीश कुमार वर्ष 2001 में फिर से रेल मंत्री बने और 2004 तक इस पद की कमान संभाली। रेल भवन में उनके आसीन रहने के दौरान ही फरवरी 2002 में गोधरा ट्रेन कांड हुआ, जिसने जल्द ही गुजरात को सांप्रदायिक आग के लपेटे में ले लिया। दिल्ली में सत्ता के गलियारों में नीतीश अपने राजनीतिक और प्रशासनिक कौशल को मांजने में लगे रहे और इस कारण वह लालू से दूर होते चले गए। 
बहरहाल, बिहार विजय के बाद भाजपा की खिलाफत वाली राजनीति के केंद्र में इनकी अहमियत भी बढ़ेगी। इस लिहाज से कहा जाये तो बिहार के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगह थी। अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद उत्तर प्रदेश की बारी है। महागंठबंधन को मिला विजय चौंका देने वाला है। उसकी जीत का आंकड़ा 178 तक पहुंच गया। जिस तरह से बिहार के इस चुनाव में केंद्र सरकार ने अपनी ऊर्जा खर्च की, ऐसा उदाहरण राज्यों के चुनाव में प्राय: नहीं देखा गया है। इस पूरे अभियान का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर किया। उनकी मदद अमित शाह और भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं ने की। इसकी तुलना में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी ने इसका जवाब 1990 के दशक के सामाजिक न्याय के मुद्दे को फिर से उठाकर दिया। जब बिहार में चुनाव की घोषणा हुई थी, तब महागंठबंधन व्यवस्थित नहीं था। बहरहाल, केन्द्र सरकार की भारी भरकम रणनीति के सामने क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी कौशल भारी रहा। कुल मिलाकर नीतीश का यह नारा कामयाब रहा-बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है।

इकॉनामी के लिए ‘रामबाण’ है जीएसटी

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों पर प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार चुनाव में मिली भारी पराजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बात का आभास है कि संसद का शीतकालीन सत्र काफी हंगामेदार होगा। 4 सीटों से 27 सीटों पर बिहार में पहुंची कांग्रेस को इस चुनाव ने नया जीवनदान दे दिया है। ऐसे में वह मोदी सरकार की फजीहत करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखने वाली है। वह मोदी सरकार की योजनाओं को पलीता लगाने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहेगी। ऐसे में महत्वाकांक्षी जीएसटी बिल के बहाने कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार की बांह उमेठने से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चाय पर आमंत्रित कर कुशल रणनीतिकार के रूप में खुद को साबित किया है। कहा जा रहा है कि इस चाय पर चर्चा के दौरान जीएसटी बिल पर कांग्रेस ने समर्थन का भरोसा दिया लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दोबारा इसमें फच्चर फंसा दिया। वह इसमें तीन सुधार चाहते हैं। जबकि सच यह है कि अगर राहुल की बात मान ली जाए तो फिर जीएसटी के कोई मायने मतलब ही नहीं रह जाएंगे। बहरहाल, तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत अन्य कई दलों ने जीएसटी बिल को देशहित में मानते हुए अपने समर्थन का ऐलान कर दिया है। इससे सरकार को थोड़ी सी राहत मिली हुई है। गौरतलब है कि जीएसटी बिल लोकसभा से पास हो चुका है लेकिन राज्यसभा में अटका पड़ा है। चूंकि उच्च सदन में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं है इसलिए बिल को पास कराने के लिए अन्य विपक्षी दलों का सहयोग जरूरी है। वैसे आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल पुथल और मांग में गिरावट के बीच संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में वस्तु एवं सेवा कर विधेयक का पारित होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘रामबाण’ साबित हो सकता है। 
एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी के लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार में लगभग दो प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अगर सरकार बुनियादी ढांचे पर जोर देना जारी रखती है तो वर्ष 2018-19 तक यह आंकड़ा नौ प्रतिशत तक पहुंच सकता है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि अगले दो तीन सालों में जीडीपी दो अंकों में पहुंच जाएगी। यह सौ प्रतिशत सही है कि जीएटी के लागू होने से केंद्र तथा राज्य के कुल राजस्व में भी भारी इजाफा होगा। बावजूद इसके राजनीतिक गुणा भाग के तहत जीएसटी पर सियासत हो रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी विधेयक के पारित होने से सरकार विदेशी निवेशकों को यह संदेश देने में कामयाब होगी कि आर्थिक सुधारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता बनी हुई है और ये उसकी प्राथमिकता में हैं तथा वह घरेलू स्तर पर आर्थिक चुनौतियों से निपट सकती है। 
संसद के पिछले सत्र में कोई विधायी कामकाज नहीं होने के कारण सदन का काम सुचारु रूप से चलाने का जिम्मा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद संभाला है। इसके लिए वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले है और विपक्षी नेताओं के साथ मेलजोल बढ़ा रहे हैं। जीएसटी लोकसभा में पारित हो चुका है जबकि विपक्ष के विरोध के कारण राज्यसभा में लंबित है। विश्लेषकों के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जीएसटी को पारित करने का यह सही समय है और देश की आर्थिक स्थिति इसमें देर करने की हालत में नहीं है। पेरिस आतंकवादी हमले के बाद विश्व की राजनीतिक स्थिति भी बदल रही है। इस हमले और इसके बाद की घटनाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंद किया है। यूरोप, चीन और जापान में पहले ही मंदी का दौर चल रहा है। इसका असर देर सबेर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। ऐसे में जरूरी है कि सियासत को एक किनारे रखकर देशहित में इस बिल को सभी दल मिलकर पारित करायें। राजनीति करने के लिए बहुत सारा समय शेष है। जीएसटी के लागू होने से कर संग्रहण की जटिलताएं दूर होगीं और अप्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाया जा सकेगा। इससे उत्पादन की लागत में कमी आएगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा जिससे उनकी क्रय क्षमता बढ़ेगी। मुद्रास्फीति में भी कमी आएगी। जीएसटी को पारित करने में राजनीतिक दलों की एकजुटता से घरेलू और विदेशी निवेशकों में सकारात्मक संदेश जाएगा जिसकी अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए सख्त जरूरत है। जानकारों का कहना है कि जीएसटी को पारित करने के लिए सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने मतभेद दूर करने चाहिए। सरकार को अपनी ओर से इनकी समस्याओं का निराकरण करते हुए बीच का रास्ता निकालना चाहिए। 
फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। सरकार के कई प्रयासों के बावजूद देश में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है। देश के उद्योगों की धड़कन माने जाने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सितंबर में चार महीने के न्यूनतम स्तर 3.6 प्रतिशत पर आ गया है। लगातार दो सालों से मानसून के कमजोर होने से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घट रही है। इससे कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में मांग प्रभावित हो रही है। खाद्य पदार्थों की उच्च मुद्रास्फीति से भी सेवा क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र की मांग घट रही है। समय आ गया है कि देशहित पर सियासत को तवज्जो देने की परिपाटी बंद हो। सिर्फ एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए या फिर श्रेय किसी दूसरे को मिल रहा है इस कारण से किसी बिल को पारित न होने देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। सियासत में विरोध जायज है लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध हो यह किसी भी तरह से उचित नहीं है।

Sunday, October 18, 2015

सजनी हमहूं राजकुमार

(राष्ट्रीय मासिक पत्रिका कैमूर टाइम्स में प्रकाशित)
बद्रीनाथ वर्मा
मगध एक्सप्रेस मुगलसराय से खुलकर दिलदारनगर को पीछे छोड़ते हुए जैसे ही कर्मनाशा नदी पार कर बिहार की सीमा में प्रवेश करती है, सियासत की शातिर हवा फिजा में महसूस होने लगती है। बक्सर आते-आते यह हवा अपने पूरे रौ में प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन की बोगियों तक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगती है। बिहार चुनावी मोड में आ चुका है, इसका आभास यहां भली-भांति होने लगता है। चुनावी चर्चा से ट्रेन की बोगियां भी अछूती नहीं रह जाती हैं। पटना पहुंचते-पहुंचते सियासी धुंध पूरी तरह से छंट जाती है। प्लेटफार्म से बाहर निकलते ही सब कुछ साफ साफ नजर आता है। यहां हर कोई ‘सजनी हमहूं राजकुमार’ की तर्ज पर बिहार को बदलने का दावा कर रहा है। यहां ख्वाबों की मंडी सच चुकी है। राजनीतिक दलों में सपना बेचने की होड़ लगी है। चुनावी मंडी में कौन कितना बड़ा सपना बेच सकता है, इसके लिए बाकायदा एक दूसरे को धकियाकर मतदाताओं को लुभाने की एक से एक तरकीबें आजमाई जा रही हैं। इसके लिए हर सड़क, चौराहा, यहां तक कि नुक्कड़ों व गलियों तक को नहीं बख्शा गया है। राजधानी पटना की सड़कों पर लगे नेताओं के बड़े-बड़े होर्डिंग्स बता रहे हैं कि बिहार बस उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है। ‘आगे बढ़ता रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार’ या ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’ के उद्घोष के साथ होर्डिंग्स के मामले में नीतीश कुमार तमाम विपक्षी दलों को मीलों पीछे छोड़ते प्रतीत हो रहे हैं। कोई ऐसी सड़क या गली नहीं बची है जहां नीतीश कुमार के बड़Þे बड़े होर्डिंग्स न लगे हों। होर्डिंग्स हालांकि भाजपा के भी कम नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटोयुक्त होर्डिंग महागठबंधन पर प्रहार कर रहे हैं। ‘अपराध, अहंकार भ्रष्टाचार, क्या इस गठबंधन से बढ़ेगा बिहार’। होर्डिंग्स की कमी को भाजपा परिवर्तन रथ से पूरी कर रही है। पटना समेत पूरे बिहार में घूम रहे परिवर्तन रथ एक तरफ केंद्र सरकार की उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं वहीं कल तक एक दूसरे को गरियाने वाले लालू यादव व नीतीश कुमार द्वारा एक दूसरे की शान में पढ़े गये कसीदों की रिकार्डिंग सुनाकर मतदाताओं को बताया जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन सिर्फ सत्ता हासिल करने भर के लिए बना है। वाकई बड़ी विचित्र स्थिति है। कल तक एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाने वाले आज एक दूसरे के सामने ताल ठोंक रहे हैं। ललकार रहे हैं। चाहे वह पप्पू यादव हों या जीतनराम मांझी। जिस जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनाया वह विरोधी के शामियाने की शोभा बढ़ा रहे हैं और जिनके शामियाने में खुद नीतीश कुमार पालथी मारे बैठे हैं कल तक उन्हें जंगलराज का मसीहा करार देते हुए गाली देते नहीं अघाते थे। लेकिन आज चुनावी मजबूरी ने दोनों को एक ही छत के नीचे ला खड़ा किया है। बिहार की सत्ता उनके हाथों से छीनने को आतुर भाजपा लगातार उनके इसी जुमले ‘जंगलराज’ को हथियार बनाकर वार पर वार किये जा रही है। भाजपा के वार से घायल नीतीश को इसका सटीक जवाब नहीं सूझ रहा। मुश्किल यह है कि सांप्रदायिकता जैसे शब्द बेअसर साबित हो चुके हैं। बिहार में विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाले नीतीश की परेशानी वाकई इस बात ने बढ़ा दी है कि चुनाव में उनके रथ का सारथी वह है जिस पर जंगलराज का तोहमत लगाकर कल तक वह उसकी परछाई तक से परहेज करते थे। इसी तरह लालू का खेल बिगाड़ने में लगे पप्पू यादव पर राजद व जदयू दोनों हमलावर हैं। पप्पू यादव के सियासी असर के सवाल पर जदयू प्रवक्ता नीरज उन्हें बिहार की राजनीति का शिखंडी करार देते हैं। जदयू प्रवक्ता ने कैमूर टाइम्स से कहा कि भाजपा पप्पू का इस्तेमाल वोट कटवा के रूप में कर रही है, लेकिन बिहार में ‘पप्पू कांट डांस’ साबित होगा। उधर, राजद प्रवक्ता भगवान सिंह कुशवाहा ने पप्पू को भाजपा के टॉप-अप पर रिचार्ज होकर चलने वाला नेता बताया। वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी लालू-नीतीश के गठजोड़ पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि बिहार में सरकार बनाने के लिए नहीं, दूसरा दल सरकार न बना ले, इसके लिए गठजोड़ हुआ है। यही नहीं अपने हर भाषण में नीतीश पर निशाना साधते हुए सुशील मोदी लगातार भाजपा से गठबंधन तोड़ने को लेकर प्रहार करते हुए सवाल उठाते हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री कहते हैं गठबंधन तोड़ने का अधिकार हर किसी को है लेकिन जनादेश तोड़ने का अधिकार किसी के भी पास नहीं। अगर उन्हें गठबंधन तोड़ना ही था तो फिर से चुनाव मैदान में आते। सिर्फ सत्ता के लिए गठबंधन जनता के साथ छलावा है। बहरहाल, बात होर्डिंग्स की हो रही थी। पटना शहर के बिजली के खंबों पर लोकजनशक्ति पार्टी का कब्जा है। चिराग पासवान के ऐलाने जंग जैसी मुद्रा वाली तस्वीरों के साथ छोटे-बड़े होर्डिंग्स व पोस्टर ‘इसी चिराग से होगा बिहार का हर घर रौशन’ छाये हुए हैं। कहीं कहीं लालू प्रसाद यादव के साले व लालू राज में जंगलराज के प्रतीक कहे गये साधु यादव की पार्टी गरीब जनता दल (सेक्युलर) भी बिहार को बदलने का दावा कर रही है। यदा कदा राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के पोस्टर भी नीतीश कुमार सरकार की असफलता गिनाती नमूदार है। इससे इतर बिहार को बदलने के लिए केवल एक साल की मांग कर रहे पप्पू यादव का दावा है कि यदि इस दौरान वे बिहार को नहीं बदल पाये तो राजनीति से संन्यास ले लेंगे। उनके भी बड़े बड़े होर्डिंग्स पटना के मुख्य-मुख्य जगहों पर अपना कब्जा जमाये हुए हैं। पप्पू के सवाल उठाते पोस्टर समाधान भी बताते हैं। मसलन, ‘जब महिलाओं पर हो रहा है अत्याचार तो कैसे बढ़ेगा बिहार, लेकिन बदलेगा बिहार, बढ़ेगा बिहार, मैं बदलूंगा बिहार।’ ऐसे में भला लालू प्रसाद यादव कैसे पीछे रह सकते हैं। लालू व राबड़ी देवी के फोटो से युक्त उनके पोस्टर भी राजधानी पटना में छाये हुए हैं। राजद के पोस्टरों में लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव को भी विशेष तवज्जो दी गई है। यह इस बात का भी ईशारा है कि लालू के वारिस तेजस्वी यादव ही होंगे। उनके पोस्टरों में ‘काम कुछ नहीं, प्रचार ज्यादा, क्या यही है तेरा अच्छे दिनों का वादा’ के जरिए सीधा पीएम नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया गया है। इसी तरह राजद के एक और पोस्टर की चर्चा जरूरी है। ‘ठगों की बातों में न आएं, चलो अपना बिहार बनाएं।’ बहरहाल, अभी चुनाव के तारीखों की घोषणा नहीं हुई है लेकिन हरेक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए अभी से अपना एड़ी चोटी का जोर लगा चुका है। लोकसभा चुनाव में महाबली मोदी के हाथों जबरदस्त शिकस्त खा चुके राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बार कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहते। गठबंधन के साझीदारों का मानना है कि भाजपा लगभग 30 फीसदी व सहयोगियों को मिलाकर एनडीए के खाते में महज तकरीबन 38 फीसदी ही मत गये थे। यानी कि 62 प्रतिशत मतदाताओं का रुख एनडीए के खिलाफ था। इसी 62 फीसदी को साधने के लिए लालू को जहर पीकर भी नीतीश का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा है। उधर, बिहार में लगभग 14 फीसद यादव मतदाताओं पर अपना एकाधिकार मानने वाले लालू प्रसाद यादव की हवा निकालने के लिए भाजपा अपने सभी यादव नेताओं को इसमें सेंध लगाने के लिए मैदान में उतार चुकी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा इस बार कम से कम 70 सीटों पर यादव उम्मीदवारों को खड़ा करेगी। खास बात यह है कि भाजपा उन्हीं सीटों पर यादव उम्मीदवार खड़ा करेगी, जहां से जदयू अपने उम्मीदवार उतारेगा। इस प्रकार भाजपा की यह रणनीति होगी कि जदयू को राजद के यादव मतदाताओं का वोट न मिले। बिहार में यादवों का असली नेता कौन है हालांकि इस पर विवाद है। लालू जहां खुद को यादवों का एकमात्र नेता मानते हैं वहीं विरोधी इसको सिरे से खारिज करते हैं। विरोधियों का दावा है कि अगर वाकई लालू की पैठ यादवों में होती तो उनकी पत्नी और बेटी लोकसभा चुनाव में यादव बहुल्य सीटों से क्योंकर हार गईं। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार व विश्व संवाद केंद्र के संपादक संजीव कुमार कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि लालू  प्रसाद यादवों के बड़े नेता हैं लेकिन एकमात्र नेता नहीं हैं। नब्बे के दशक से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। अब पप्पू यादव से लेकर हुक्मदेव नारायण यादव व रामकृपाल यादव तक तमाम नेताओं की यादव वोटों पर अपनी अपनी दावेदारी है। बहरहाल, अभी की स्थिति यह है कि पोस्टरों के मामले में नीतीश कुमार जहां सबसे आगे चल रहे हैं वहीं 340 परिवर्तन रथ के सहारे भाजपा पूरे बिहार में एक बार फिर मोदी की आंधी को सुनामी में बदलने के लिए दिन रात एक कर चुकी है। वैसे अभी यह भविष्य के गर्भ में है कि कौन किस पर भारी पड़ेगा या किस गठबंधन की सरकार बनेगी। आंकड़े भले ही कुछ भी कहें लेकिन राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होते। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि मोदी का रथ रोक पाने में यह गठबंधन कितना कारगर साबित होगा।  या कि तमाम किंतु परंतु के बावजूद नीतीश के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनेगी। फिलहाल तो हम यही कह सकते हैं कि तेल देखो और तेल की धार देखो।

आरक्षण की भट्ठी पर सियासी रोटियां

देश के कई प्रमुख समाचारों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह क्या दी, मानो सियासी गलियारों में तूफान आ गया। बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख के आए इस बयान ने जहां भाजपा के हाथ पांव फूला दिये वहीं विपक्षी दलों को बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया। हालांकि संघ की विचारधारा को समाज व देश को बांटने वाला बताने वाली कांग्रेस की तरफ से आश्चर्यजनक तरीके से इस मुद्दे पर समर्थन दिखा। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि गरीबी सबसे बड़ा पिछड़ापन है। अब समय आ गया है कि इसपर बात की जाए कि इस 21वीं सदी में आरक्षण प्रासंगिक है या नहीं। अगर हां, तो आरक्षण का क्या आधार होना चाहिए। सबसे बेहतर तो ये रहेगा कि जाति, समुदाय और धर्म से ऊपर उठकर आरक्षण का आधार आर्थिक किया जाए। बहरहाल, लालू से लेकर मायावती तक और जदयू से लेकर माले तक सभी के सभी दाना पानी लेकर भाजपा व संघ पर चढ़ दौड़े हैं। जंगलराज का तोहमत झेल रहे ये वही लालू प्रसाद यादव हैं जिनके कभी घनिष्ठ सहयोगी रहे रामकृपाल यादव और पप्पू यादव उन पर सामाजिक न्याय की आड़ में परिवारवाद का पोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं। मोहन भागवत ने संघ के मुखपत्र में केवल आरक्षण की जरूरतों व समयसीमा को लेकर समीक्षा करने की बात कही थी। उनका यह कहना आरक्षण को अपनी राजनीतिक  बैसाखी बना चुके इन दलों को गवारा नहीं हुआ। लालू प्रसाद ने सबसे तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने संघ प्रमुख पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो आरक्षण समाप्त कर के दिखाओ। आरक्षण पर राजनीति और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए संघ प्रमुख ने सुझाव दिया था कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को और कितने दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ऐसी समिति में राजनीतिकों से ज्यादा 'सेवाभावियों' का महत्व होना चाहिए। गुजरात में पाटीदार और राजस्थान में गुर्जर सहित कई क्षेत्रों में कई जातियों को आरक्षण देने की बढ़ती मांगों की पृष्ठभूमि में सरसंघचालक का यह बयान बर्र के छत्ते में हाथ डालने वाला साबित हुआ। 'फेसबुक' के अपने वॉल पर तथा ट्वीट कर लालू ने भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए लिखा, मैं डरपोक भाजपाइयों को चैलेंज  देता हूं कि तुम आरक्षण खत्म करने को कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पिया है तो खत्म करके दिखाओ। किसकी कितनी ताकत है, पता चल जाएगा। बिहार में जारी चुनावी घमासान के आलोक में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने आगे लिखा ‘लालू नली-गली में मिट जाएगा परंतु मुट्ठीभर अभिजात्यों का एजेंडा बहुसंख्यक बहुजनों पर लागू नहीं होने देगा।’ लालू यहीं नहीं रुके उन्होंने ट्वीट किया, आरएसएस व भाजपा आरक्षण खत्म करने के लिए कितना भी सुनियोजित माहौल बना ले, देश के 80 प्रतिशत दलित व पिछड़ा इनका मुंहतोड़ करारा जवाब देगा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल करते हुए लिखा, ‘लोकसभा चुनाव में खुद को पिछड़ा बता कर वोट ठगने वाला, तथाकथित चाय बेचने वाला, हाल ही पिछड़ा बने नरेंद्र मोदी बताएं कि वो अपने 'आका' के कहने पर आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं?’ जनता दल यू ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इसे पिछड़ों और वंचितों को कमजोर करने का प्रयास करार देते हुए जदयू के प्रवक्ता के सी त्यागी ने कहा कि मौजूदा आरक्षण नीति में किसी प्रकार की छेड़छाड़ संविधान के खिलाफ है। आरक्षण अभी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है और इस स्थिति में आरक्षण नीति की समीक्षा से निश्चित रूप से पिछड़े एवं कमजोर वर्गों का अहित होगा। उधर मायावती ने भी आरक्षण को संवैधानिक व्यवस्था बताते हुए धमकी दे दी कि अगर इसको हटाने की बात की गई तो देश भर में आंदोलन किया जाएगा। आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार किए जाने के भागवत के सुझाव की विपक्ष द्वारा तीखी आलोचना किए जाने के बीच केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा किए जाने के पक्ष में नहीं है। कैबिनेट की बैठक के बाद केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार और भाजपा दोनों का मत है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता नहीं है। हमारा विश्वास है कि आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक प्रगति के लिए यह आवश्यक है। हालांकि माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य की नजर में भाजपा की असहमति दिखावा है। उनका मानना है कि इसके जरिए भाजपा भ्रम पैदा करने की कोशिशें कर रही है लेकिन बिहार और पूरे देश की जनता संघ परिवार की सामंती-सांप्रदायिक पक्षधरता और दलित-गरीब-पिछड़ा विरोधी रुख से परिचित है। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने भागवत के बयान से सहमति जताते हुए तर्क दिया कि आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट आखें खोलने वाली है क्योंकि इस रिपोर्ट के अनुसार 83 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा 87 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोगों की मासिक आय एक हजार रुपये से भी कम है। तथ्य है कि आरक्षण का लाभ पांच प्रतिशत से भी कम लोगों को मिला है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आजादी के इतने वर्षों तक आरक्षण जारी रहने के बाद भी उसका लाभ कहां चला गया। उत्तर सरल है कि इन जातियों के सम्पन्न लोगों ने ही इसका लाभ उठाया। एक बार मांग उठी थी कि इन वर्गों के सम्पन्न लोगों को आरक्षण का लाभ न दिया जाए। सुझाव उचित तथा महत्वपूर्ण था पर सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया। विभिन्न पार्टियों के कई नेता इसी संपन्न तबके से आते हैं। 
अब सवाल यह है कि भागवत का यह बयान अनायास ही है या फिर सोची समझी रणनीति के तहत। इस संदर्भ में  यहां एक बात का जिक्र करना जरूरी लगता है। लोकसभा चुनाव से पहले मेरी मुलाकात संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी से हुई। उस दौरान मैंने संघ और भाजपा के सबंधों को समझने के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को लेकर उनसे एक प्रश्न पूछा था। प्रश्न का उत्तर देने से पहले उन्होंने जो एक बात कही वह यह कि पूर्व संघ प्रमुख सुदर्शन जी की तरह भागवत जी की जुबान फिसलती नहीं है। मै यह चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि अभी आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख का बयान आया है। अगर जुबान न फिसलने वाली बात सही है तो फिर बिहार विधान सभा चुनाव की पूर्व बेला पर यह बयान अपने पीछे कई सवाल छोड़े जा रहा है।