Monday, August 13, 2012

नहीं चाहिए दीदी की दया


 ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति के लिए प्रणब मुखर्जी का नाम खारिज क्या किया। मानो प्रदेश कांग्रेस को उनसे छुटकारा पाने का एक अच्छा मौका ही हाथ लग गया। प्रदेश कांग्रेस के छोटे से लेकर बड़े तक सभी नेता उनकी तुलना मीर जाफर से करने लगे। लगे हाथों केंद्रीय नेतृत्व से मांग की जाने लगी कि उन्हें तृणमूल गठबंधन से बाहर आने की इजाजत दी जाये। कांग्रेस के बरहमपुर से सांसद अधीररंजन चौधरी ने तो ममता से नाता तोड़ लेने की सलाह दे डाली। हालांकि ममता मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मानसरंजन भुइयां जैसे एकाध लोग कुर्सी मोह से बंधे भी नजर आये। जाहिर है यदि ममता को केंद्र सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया जायेगा तो वह भी राज्य मंत्रिमंडल में शामिल कांग्रेस नेताओं को भी पैदल कर देंगी। मानसरंजन यह बात अच्छी तरह से जानते हैं।
बहरहाल राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम को खारिज करने पर गुस्से और सदमे से भरे पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेताओं ने तृणमूल अध्यक्ष की तुलना मीर जाफर से की । गौरतलब है कि 18वीं सदी में मीर जाफर की सिराजुद्दौला के साथ गद्दारी की वजह से ही बंगाल और आखिरकार पूरे देश पर अंग्रेजी कब्जे का रास्ता साफ हुआ था। प्रणव मुखर्जी के विरोध को बंगाली अस्मिता का सवाल बनाते हुए प्रदेश कांग्रेस ममता को घेरने में जुट गया है। हालांकि ममता भी जानती थी कि इसे बंगाली विरोध माना जा सकता है इसीलिए तो उन्होंने सोमनाथ चटर्जी का नाम आगे बढ़ाया था। बहरहाल नलहाटी से विधायक और प्रणब के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने मुख्यमंत्री के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने साथ ही कहा कि इस मौके पर वे और कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि इससे उनकी (प्रणब की) संभावनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है।
बहरामपुर के दिग्गज कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने कहा कि यह बंगाल के इतिहास का काला दिन है। यह 1996 (जब माकपा की केंद्रीय समिति ने प्रधानमंत्री पद के लिए ज्योति बसु के नाम को मंजूरी से इनकार कर दिया था) की पुनरावृत्ति है। ममता की तुलना अब सिर्फ मीर जाफर से ही हो सकती है। उन्होंने बंगालियों को धोखा दिया है और अब वे बंगाल के माथे पर दाग बन चुकी हैं।
प्रणब मुखर्जी की दावेदारी के समर्थन के लिए ममता से सार्वजनिक अपील कर चुके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि मुख्यमंत्री का यह कदम व्यक्तिगत खुन्नस में उठाया गया प्रतीत होता है। लेकिन इससे बंगालियों की भावनाएं आहत हुई हैं और ममता को इसकी कीमत चुकानी होगी। ममता को लगता है कि पश्चिम बंगाल को आर्थिक संकट से उबारने के लिए राहत पैकेज देने में प्रणब टालमटोल कर रहे हैं और वे कई बार इस पर अपनी झुंझलाहट का इजहार कर चुकी हैं। इस साल के शुरू में उन्होंने तृणमूल संसदीय की बैठक में रेल भाड़ा बढ़ाने के पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के प्रस्ताव को प्रणब मुखर्जी की 'करामातÓ बताया था।
पश्चिम बंगाल कांग्रेस विधायक दल ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का ममता बनर्जी द्वारा अनौपचारिक ढंग से विरोध किए जाने के बाद कहा कि अब तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करना बहुत कठिन हो गया है। राज्य के कांग्रेस विधायक दल ने पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर सत्तारूढ़ गठबंधन छोडऩे की अनुमति मांगी है। कांग्रेस विधायक दल के नेता मुहम्मद सोहराब ने कहा, कि हमने देखा है कि ममता बनर्जी ने किस तरह अनौपचारिक ढंग से मुखर्जी की उम्मीदवारी से खुद को अलग कर लिया। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस के साथ राज्य सरकार का एक हिस्सा बनकर रहना हमारे लिए सहज नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने यहां कहा, हमारे विधायक उनके साथ सहज रूप से काम नहीं कर पाएंगे। हाल के राजनीतिक परिदृश्य ने हमारे लिए गठबंधन में बने रहना बहुत मुश्किल कर दिया है। हम पार्टी आलाकमान से अनुरोध करते हैं कि वह इस बारे में फैसला ले।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जो अब तक तृणमूल कांग्रेस का विरोध करने से हिचकती रही है, अब सदन में जोरदार ढंग से उसका विरोध करेगी।
गौरतलब है कि ममता ने शुरुआत में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित किया था, जिस कारण उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
भट्टाचार्य ने कहा, हम मुख्यमंत्री (ममता) के अनैतिक व्यवहार की कड़ी निंदा करते हैं। वह एक तरफ लोकतंत्र के संघीय ढांचे की वकालत करती हैं और दूसरी ओर अपेक्षा रखती हैं कि केंद्र सरकार इसको नजरअंदाज कर दे और अर्थसंकट झेल रहे बंगाल को वित्तीय सहायता दे।
 पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ संबंधों में आए तनाव के बाद कांग्रेस ने कहा है कि राज्य में ममता बनर्जी की सरकार में उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही है और पार्टी को अपने बूते आगे बढऩे का अधिकार है।
प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया, 127 साल पुरानी पार्टी को अपने बूते आगे बढऩे का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कैबिनेट में हम इतने कम हैं कि हमारी आवाज नहीं सुनी जाती है।
कांग्रेस ने एएमआरआई अस्पताल अग्निकांड के बाद की स्थिति, गोरखालैंड मांग और नक्सल प्रभावित जंगलमहल में समस्याओं सहित कई मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया। भट्टाचार्य ने कहा कि वस्तुत: यह तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस सरकार का एक छोटा सा हिस्सा है। बुनियादी नीति और अन्य फैसले तृणमूल कांग्रेस लेती है और इसे तृणमूल कांग्रेस ही लागू करती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच किसी तनाव से गठबंधन पर असर नहीं पड़ेगा।
बद्रीनाथ वर्मा

खेल अभी खत्म नहीं हुआ है



राजनीति में सब जायज है का सिद्धांत नीति को ले डूबा बस राज रह गया वो भी जरा सा !

इन्ट्रो- दिल की राजनीति करने वाली दीदी घाघ और मौकापरस्त राजनीतिज्ञ नेताजी के पैंतरे से तिलमिलाई हुई हैं। अभी चुप हैं। पर ममता के जिद्दी और बेलौस स्वभाव से परिचित जानते हैं कि उनकी यह चुप्पी कल नेताजी पर भारी पड़ सकती है

हाईलाईटर- राइटर्स बिल्डिंग से जबरदस्ती बाहर निकाले जाने पर ममता दुबारा उन्नीस साल बाद तब गईं जब वह मुख्यमंत्री बन गईं
- तीन दशक से राजनीति में हैं ममता दीदी पर उनके दामन एक भी बदनुमा दाग नहीं है


खेल अभी खत्म नहीं हुआ है ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

महामहिम महाकाव्य की तीसरी और सबसे अहम किरदार हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। दीदी के रूप में मशहूर ममता कभी सोच भी नहीं सकती थीं कि जिन नेताजी पर वह आंख मूंदकर भरोसा कर रही हैं वही उन्हें इस तरह गच्चा दे जाएंगे। दरअसल इसमें नेताजी की उतनी गल्ती नहीं है। ममता ही उन्हें समझने में भूल कर गईं। ममता के बारे में अक्सर ही यह कहा जाता है कि वह सोचने का काम भी दिल से ही करती हैं। इसलिए अक्सर गच्चा खा जाती हैं।
बहरहाल मुलायम सिंह यादव के रातोंरात पाला बदल लेने के बाद दीदी ने यह कह कर कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, अपनी मंशा का इजहार कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ममता बनर्जी सहज में ही हार मानने वालों में नहीं हैं। भले ही पहलवान रहे मुलायम सिंह यादव ने प्रणब के नाम का समर्थन कर ममता बनर्जी को धोबियापाट दे दिया हो पर ममता ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। उन्हें तत्काल समझ आ गया कि आखिर क्यों नेताजी पल्टी मार गए। बस फिर क्या था, उन्होंने भी मुलायम की मंशा पर पानी फेरते हुए कह दिया कि वह यूपीए से या सरकार से बाहर नहीं आ रही हैं। इस तरह मुलायम सिंह के मंत्री बनने के सपने को फिलहाल उन्होंने चकनाचूर कर दिया है।
ममता को निकट से जानने वालों का कहना है कि दीदी अपने दोस्त व दुश्मन को हमेशा याद रखती हैं। एक नंबर की जिद्दी ममता जब एक बार कोई काम मन में ठान लेती हैं तो फिर उसे पूरा किये बिना दम नहीं लेतीं। जाहिर है वह नेताजी को भी कभी न कभी मजा जरूर चखाएंगी। इस संबंध में एक घटना का उल्लेख करना यहां समीचीन होगा। लगभग 20 साल पहले ममता बनर्जी एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलने राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग गईं थीं। वहां से किसी कारणवश उन्हें जबरदस्ती बाहर निकाल दिया गया। उसी समय उन्होंने शपथ खाई थी कि वह राज्य सचिवालय में तभी कदम रखेंगी जब इसके योग्य बन जायेंगी। उन्होंने अपने इस सौगंध को हर पल याद रखा। उन्होंने राइटर्स बिल्डिंग के अंदर दुबारा तभी प्रवेश किया जब वह राज्य की मुख्यमंत्री चुनी जा चुकी थीं। इसके लिए उन्होंने सुदीर्घ 19 वर्षों तक इंतजार किया। उनकी इस तरह के कार्यकलापों की प्रशंसा किये बिना ममता के विरोधी भी नहीं रह पाते। ममता जिद्दी हैं, तुनकमिजाज हैं यह सच है लेकिन वह धोखेबाज नहीं हैं। जबकि मुलायम के बारे में कहा जाता है कि वह लोगों के साथ तभी तक रहते हैं जब तक उनका हित सधता रहता है। जैसे ही उन्हें लगता है कि इन तिलों में अब तेल नहीं है तुरंत पाला बदल लेते हैं। मौकापरस्ती के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं मुलायम सिंह यादव। जैसे ही कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम का ऐलान किया वैसे ही ममता का साथ छोड़कर नेताजी कांग्रेस के पाले में आ गए। इससे खुद को ठगा महसूस कर रही दीदी ने अपने स्वभाव के विपरीत संयम का परिचय देते हुए नेताजी के खिलाफ कुछ कहा तो नहीं किंतु उन्हें निकट से जानने वालों का दावा है कि इस धोखे का जवाब ममता उन्हें जरूर देंगी। उनकी हालत इन दिनों घायल शेरनी जैसी है।
ममता की अक्सर उनकी तुनकमिजाजी व केंद्र को सांसत में डालने जैसी हरकतों के लिए आलोचना होती रहती है। उन पर आरोप लगता है कि वह केंद्र को ब्लैकमेल करने की हद तक उस पर दबाव बढ़ाती हैं। दरअसल उनका यह तरीका भले ही दूसरों की नजर में गलत लगे पर इस सबका उद्देेश्य एक मात्र बंगाल की भलाई ही होता है। इस नजर से अगर देखा जाए तो उन्हें गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। रेलमंत्री रहने के दौरान भी उनका विशेष ध्यान बंगाल पर ही रहता था। इससे उन पर छींटाकशी भी की जाती थी। उन्हें केंद्रीय रेलमंत्री के बजाय बंगाल का रेलमंत्री कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।
ममता जिद्दी हैं, तुनकमिजाज हैं, अपनी बातें मनवाने के लिए ब्लैकमेल की हद तक चली जाती हैं आदि सारी बातें सच हैं पर एक सच्चाई यह भी है कि लगभग तीन दशक से अधिक राजनीतिक जीवन में रहने के बावजूद उनके दामन पर एक भी बदनुमा दाग नहीं हैं। व्यक्तिगत जीवन में काफी ईमानदार मानी जाने वाली ममता सादगी पसंद हैं। पैरों में हवाई चप्पल व नीली या काली बार्डर वाली सफेद साड़ी उनकी पहचान है। राज्य की मुख्यमंत्री होने के बावजूद वह आज भी कालीघाट स्थित अपने उसी टालीबाड़ी में रहती हैं जहां शुरू से ही वह रहती आई हंै। उनके व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी है कि वह भी एक आम भारतीय महिला जैसी धार्मिक कर्मकांड में पूरा विश्वास करती हैं। उन्हें मां काली व संतोषी माता में अगाध श्रद्धा है। आज भी वह प्रत्येक शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत जरूर रखती हैं। यही नहीं जब उनकी मां गायत्री देवी जीवित थीं उस समय घर से निकलते वक्त उनका आशीर्वाद लेना ममता कभी नहीं भूलती थीं।
बहरहाल मुलायम सिंह के यू टर्न लेने से ममता मन ही मन आग बबूला तो हैं पर उन्होंने इसे उजागर नहीं किया है। उन्होंने कहा कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, इंतजार कीजिए! ऐसे में यहां सवाल उठता है कि यह खेल क्या है। और किसका खेल खत्म नहीं हुआ। ममता का या मुलायम का। दरअसल ममता और मुलायम की जोड़ी को स्वाभाविक माना भी नहीं जा रहा था। क्योंकि जब भी ममता केंद्र सरकार की फजीहत करने पर उतारू होतीं तो उनका विकल्प मुलायम सिंह में तलाशा जाने लगता था। दिनेश त्रिवेदी प्रकरण में भी यही हुआ था। रेलमंत्री पद से दिनेश त्रिवेदी को हटाये जाने को लेकर जो हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। उस वक्त लगभग तय हो गया था कि ममता को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। बाकायदा मुलायम सिंह को रेलमंत्री बनने का प्रस्ताव भी दे दिया गया था। सूत्रों के अनुसार नेताजी ने इसे स्वीकार भी कर लिया था। पर अचानक ममता के दिल्ली आ जाने से वह योजना परवान नहीं चढ़ पाई और नेताजी को बैरंग रह जाना पड़ा था। नेताजी रेलमंत्री नहीं बन पाने की कसक मन में दबाए मौके की ताक में थे। जबकि ममता की सोच थी कि यूपीए जिन मुलायम सिंह को उनके विकल्प के रूप में देखती है उन्हें ही अपने साथ कर लिया जाए। लेकिन यहीं गच्चा खा गईं ममता। मुलायम ठहरे घाघ राजनेता। उन्होंने जैसे ही देखा कि ममता व यूपीए में दूरी बढ़ रही है। आनन-फानन में ममता का हाथ झटककर यूपीए की गोद में जा बैठे। हालांकि उन्होंने सफाई दी कि वह यूपीए या सरकार का समर्थन नहीं कर रहे हैं बल्कि प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर रहे हैं। बहरहाल उनसे सलाह मशविरे के बाद ही ममता ने राष्ट्रपति पद के लिए मनमोहन सिंह के साथ ही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम व सोमनाथ चटर्जी का नाम आगे बढ़ाया था। सूत्रों का तो दावा है कि यह सोनिया की सहमति से ही हुआ था। इरादा था, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मन की टोह लेने की। पर जैसे ही पीएमओ की ओर से इस प्रस्ताव को खारिज किया गया। कांग्रेस ने अपना स्टैंड बदलते हुए सारा दारोमदार ममता पर डाल दिया। ऐसी परिस्थिति में ममता को उम्मीद थी कि नेताजी उनका साथ अवश्य देंगे। पर एक जमाने में पहलवान रहे मुलायम सिंह ने उन्हें धोबियापछाड़ दे डाला। जैसे ही कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम की घोषणा की मुलायम सिंह उनके पक्ष में जा खड़े हुए।

ममता की छवि एक फायर ब्रांड राजनेत्री, पारदर्शी नेता की है। पर उनमें सब कुछ अच्छा होने के बाबजूद अतिशय आक्रामकता है, जो हमेशा अच्छी नहीं होती। ममता ने जिस राजनितिक अपरिपक्वता का परिचय दिया यह उनके प्रशंसकों को निश्चित ही नागवार गुजरा होगा। वे एक जुझारू महिला हैं। लेकिन 13 जून को  उन्होंने जो राजनीतिक गलती की वह उन्हें जीवन भर सालती रहेगी। मुलायम सिंह जैसे परिपक्व नेता और अपने नफा-नुकसान की समझ रखने वाले कद्दावर नेता के साथ उन्होंने यूपीए पर दबाब बनाने की जो राह चुनी वह एक मंजे हुए नेता की नहीं कही जा सकती। राजनीति का पहला उसूल है कि तेल देखो और तेल की धार देखो। ममता ने न तो तेल ही देखा और न ही तेल की धार देखी। मुलायम ने तो यूपीए में ममता की दीदीगिरी की धार कुंद करने के लिए और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ही ममता का दो कदम साथ दिया और चार कदम पीछे हट गए। यह मुलायम की राजनीतिक चतुराई का परिणाम ही है कि वे अपनी बहू डिंपल को कन्नौज से निर्विरोध सांसद बना ले गए। निश्चित ही मुलायम ने ममता की आक्रामकता को हवा देकर यूपीए में अपनी वजनदारी बढ़ाने और अपरिहार्यता बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर ली। वस्तुत: ममता बारगेनिंग करने वाली महिला नेता नहीं हैं। उनमें जोश इतना अधिक है कि वे अपने होश को दांव पर लगा देती हैं। काश कि वे सोनिया जी से मिलने के बाद और मुलायम से दोबारा मिलने के बाद इतनी आक्रामक नहीं होतीं। ममता की साफगोई और राजनीतिक तेवरों की जनता प्रशंसक है। यह इसी बात से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कई दशकों के माक्र्सवादी शासन को बंगाल से उखाड़ फेंका। उनकी इसी आक्रामक शैली और दो टूक राजनीति को जनता ने पसंद किया। लेकिन चुनाव जीतने और मगरमच्छ राजनेताओं के बीच, जिनमें कुटिल राजनीतिक समझ है, निर्वाह करने में अंतर है जो ममता को अब समझ आ रहा होगा।
ममता भावनात्मक राजनीती करती हैं जबकि निश्चित ही इसमें भावनाओं का कोई महत्व नहीं होता। लेकिन ममता की भावनात्मक राजनीति राजनीतिज्ञों को भले ही रास नहीं आती हो किंतु जनता में यही उनकी ताकत है। वर्तमान भूल को छोड़ दें तो वे न केवल बंगाल में बल्कि समूचे देश में लोकप्रिय हैं। जिसका महत्वपूर्ण उदाहरण यही है कि यूपी के मथुरा कि मांट सीट पर वहां की जनता ने टीएमसी को जिताया। मुलायम की समाजवादी पार्टी ने जिस उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त कर सरकार बनाई हो वहां ममता के कैंडिडेट का जीतना क्या मुलायम के लिए खतरे कि घंटी नहीं माना जायेगा। ऐसे में ममता को धोखा देने में कोई कैसे परहेज करता। मांट में एसपी तीसरे नंबर पर रही। सच्चाई यह है कि ममता दिल की राजनीति करती हैं। पर इसबार वे चूक गईं। यदि वे दिमाग की राजनीति करतीं तो यह स्थिति नहीं बनती। अगर उन्होंने अपने मतों की संख्या बल पर गौर किया होता और मुलायम के झांसे में ना आई होतीं तो स्थिति कुछ और होती। इतने कम संख्या बल पर किंगमेकर की गलत फहमी पाल लेना भूल से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी यदि वे अपने पत्ते नहीं खोलतीं और मौन रहकर तमाशा देखतीं तो आज स्थिति कुछ और होती। यूपीए ममता की नाराजी और खुशी को इससे पहले तक गंभीरता से लिया करता था। किंतु आज उसके पास सिवाय हंसने के कुछ नहीं है। ममता ने बंगाल की जनता को भी कमोबेश नाराज ही किया है। बंगाल की जनता हो या किसी अन्य राज्य की, सभी अपने राज्य के व्यक्ति को उच्च पदों पर बैठा देखना चाहते हैं क्योंकि वह इससे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। दीदी की सोच भले ही व्यापक रही हो किंतु प्रणब दा का विरोध बंगाल की जनता को रास नहीं आया। बहरहाल ममता जाने-अनजाने गलती कर बैठी हैं किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कल थीं। ममता कल भी इतनी ही प्रासंगिक रहेंगी क्योंकि वे ईमानदारी से अपना काम करती हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव हो सकता है उनकी भूमिका को आज से अधिक महत्वपूर्ण बना दे।

हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी पर कायम हैं। संप्रग की ओर से मुखर्जी को अपना उम्मीदवार घोषित किए जाने के फैसले से अविचलित ममता ने कोलकाता में कहा कि हम कलाम की उम्मीदवारी पर कायम हैं। वह सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। हम उस रुख से नहीं पलट रहे हैं, जिसकी घोषणा हमने पहले की थी। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के पीछे हटने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मुलायम ने मुझे धोखा नहीं दिया है।
वहीं, संप्रग के उम्मीदवार का विरोध करने की तृणमूल कांग्रेस की रणनीति ने उसके कांग्रेसनित गठबंधन में बने रहने पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस का संप्रग में बने रहना उनके इस अडिय़ल रुख के चलते अधर में लटक गया है कि एपीजे अब्दुल कलाम ही राष्ट्रपति पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार होंगे जबकि संप्रग ने प्रणब मुखर्जी को अपना उम्मीदवार चुना है।
 बद्रीनाथ वर्मा 9718389836

दरियादिली, जायज कितनी


दरियादिली, जायज कितनी ( राष्ट्रीय साप्ताहिक इतवार में प्रकाशित)

इंट्रो : केकेआर की जीत पर अस्सी लाख रुपये पानी की तरह बहा देने वाली ममता बनर्जी अक्सर राज्य की कंगाली का रोना रोती रहती हैं। सवाल है, ऐसे में इस दरियादिली की जरूरत क्या थी

 अक्सर राज्य पर दो लाख करोड़ कर्ज का रोना रोकर केंद्र सरकार पर बार-बार आर्थिक मदद की गुहार लगाने वाली ममता बनर्जी की आईपीएल चैंपियन बनी शाहरुख की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स के स्वागत में पानी की तरह पैसा बहाने की खूब आलोचना हो रही है। महज घरेलू टूर्नामेंट जीतने पर टीम का शाही स्वागत किसी को पच नहीं पा रहा है। इस दरियादिली पर वामपंथी पार्टियों ने ममता को आड़े हाथों लिया है। वहीं ममता से दुखी कांग्रेसी नेता खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे, पर ममता बनर्जी की शाहरुख की टीम पर दिखाई गयी यह गैरजरूरी ममता उन्हें भी हजम नहीं हो रही है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने मंगलवार को केकेआर की टीम को सम्मानित करने के लिए ईडन गार्डन्स में भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया था। समारोह में शाहरुख खान, जूही चावला, केकेआर के खिलाडिय़ों और सपोर्ट स्टाफ को 10-10 ग्राम के गोल्ड मेडल बांटे गए। सूत्रों के मुताबिक ममता सरकार ने इस समारोह पर करीब 80 लाख रुपये फूंक डाले। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी इस बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है।
सीपीआई के वरिष्ठ नेता गुरुदास दासगुप्ता ने समारोह पर जनता का पैसा लुटाने पर ममता सरकार की जमकर आलोचना की है। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं मालूम की यह समारोह किसके लिए था? खिलाडिय़ों को सोने के मेडल बांटे गए। वे न तो कोई वल्र्ड कप जीतकर लौटे थे, न ही यह रणजी ट्रॉफी जैसी जीत थी। एक तरफ ममता राज्य के कर्जे में डूबे होने का रोना रोती रहती हैं और दूसरी तरफ इस तरह की फिजूलखर्ची करती हैं। यह बात समझ से परे है कि क्यों एक निजी लाभ के लिए बनी आईपीएल टीम की जीत को राज्य व देश की जीत बताया जा रहा है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी माकपा ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। माकपा नेता रबीन देब कहते हैं कि चूंकि ममता से राज्य की जनता का मोहभंग होता जा रहा है। इसलिए वह इस तरह के तमाशे कर जनता को बरगलाना चाहती हैं। हालांकि इससे हासिल कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री राज्य के विकास कार्यों पर ध्यान देने के बजाय अपनी ऊर्जा का ज्यादा इस्तेमाल इस तरह की नौटंकी करने में जाया कर रही हैं। इसके विपरीत सम्मान समारोह की वामपंथी दलों की ओर से की जा रही आलोचना पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए कहा कि विरोधी पार्टियां चाहे इसका कुछ भी मतलब निकालें पर सच तो यह है कि केकेआर ने समूचे देश को गौरवान्वित किया है। उन्होंने अस्सी लाख रुपये खर्च किये जाने को लेकर हो रही आलोचना पर यह कहकर बचाव किया कि हमने कुछ नहीं किया है। सबकुछ कोलकाता नगर निगम (केएमसी) द्वारा किया गया था। अन्य राज्यों में खिलाडिय़ों को करोड़ों रुपये मिलते हैं। टूर्नामेंट जीतने पर कार दी जाती है। हमें अपने मेहमानों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए यह हमें माकपा से सीखने की जरूरत नहीं है।Ó बावजूद इसके प्रबुद्ध बंगाली समाज के एक वर्ग ने भी ममता के इस फिजूलखर्ची पर सवाल उठाया है। उनके अनुसार केकेआर के सम्मान के नाम पर किए गए इस भारी व्यय का कोई तुक नहीं बनता है। केकेआर निजी लाभ के लिए बनी है।
ममता से हलकान कांग्रेस नेता खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे हैं। लेकिन यह जरूर कह रहे हैं कि केंद्र के सामने भीख मांगने वाली ममता की दरियादिली समझ से परे है। उनका कहना है कि शाहरुख खान का शो तो उनके व्यावसायिक हितों के अनुकूल है, लेकिन जिस तरह से इस व्यावसायिक तमाशे को सियासी बना दिया गया, वह समझ से परे है। बीजेपी नेता अंदरखाने तो इस कदम पर नाक-भौंह सिकोड़ रहे हैं, लेकिन औपचारिक रूप से खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। अटकलें लगाई जा रही हैं कि ममता को अपने पाले में लाने को आतुर भाजपा उनकी आलोचना कर उन्हें नाराज नहीं करना चाहती। भाजपा का मानना है कि जिस तरह ममता बनर्जी से केंद्र आजिज आ चुका है उससे निकट भविष्य में उन्हें यूपीए से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। केंद्र की ओर से इसके संकेत दे भी दिये गए हैं। यूपीए सरकार के तीन साल पूरे होने के उपलक्ष्य में दिल्ली में आयोजित डिनर पार्टी में जिस तरह से समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव को तवज्जो दी गई, उससे भी इस संभावना को बल मिला। ममता के नित नये बखेड़े से आजिज कांग्रेस अब उनसे पल्ला झाडऩे का पूरा मन बना चुकी है। हालांकि यह राष्ट्रपति चुनाव के बाद ही होगा। इसी संकेत को समझते हुए ही बहरमपुर के सांसद अधीररंजन चौधरी ने कह दिया था कि यदि इतनी ही परेशानी है तो ममता बनर्जी यूपीए छोड़ क्यों नहीं देतीं।
गौरतलब है कि पिछले दिनों पेट्रोल के दाम बढ़ाए जाने के खिलाफ ममता बनर्जी ने कोलकाता की सड़कों पर एक विशाल जुलूस निकाला था। इसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अधीररंजन ने उक्त टिप्पणी की थी। हालांकि बहरमपुर के इस सांसद को ममता विरोधी ही माना जाता है किंतु इस बार की उनकी यह टिप्पणी उनके मन की भड़ास नहीं मानी जा रही है। राज्य के राजनीतिक गलियारों में उनके वक्तव्य के अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उनका यह बयान पूरी तरह से सोच समझ कर दिया गया है। इसी बहाने ममता को उनकी औकात दिखाई गई है। प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ममता का यही रवैया रहा तो जल्द ही उन्हें यूपीए से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। उनके अनुसार किसी भी चीज की अति बुरी होती है। किसी भी चीज को सहने की एक सीमा होती है। चीजें जब हदें पार करने लगती हैं तो कोई न कोई समाधान करना ही पड़ता है। उन्होंने इशारों ही इशारों में बता दिया कि अब प्रदेश कांग्रेस को केंद्रीय नेतृत्व से परमिशन मिल गई है। अब ममता को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।  
उधर, केकेआर के मालिक शाहरुख खान ने ममता सरकार के इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि खुश रहने और खुशियां बांटने में कोई नुकसान नहीं है। इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। यह सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि हम सभी लोग खुश थे। भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया ने भी सरकार का पक्ष लेते हुए कहा कि जीत का उत्सव मनाने में लोगों की आलोचना की कोई वजह नहीं दिखती।

बद्रीनाथ वर्मा 9718389836

इंडियन पालिटिकल लीग


इंडियन पालिटिकल लीग ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित )

इंट्रो : जिन राजनेताओं को देश के विकास और दूसरे अहम कार्यों के चुना गया है वे अपना पूरा समय क्रिकेट में खपा रहे हैं। खेल से जुड़े सभी मलाईदार पदों पर राजनेताओं का ही है कब्जा।


खेल के नाम पर मजाक बन गया है आईपीएल : कीर्ति आजाद

वक्त आ गया है कि खेल के नाम पर खिलवाड़ को रोका जाए : लालू प्रसाद यादव

आईपीएल की आड़ में काले धन का खेल चल रहा है : सुब्रमण्यम स्वामी

खेल मंत्री अजय माकन ने आईपीएल में सैकडों करोड़ के टैक्स चोरी और ब्लैक मनी लगे होने की आशंका जताई है



आखिर ऐसा क्या है क्रिकेट में जो राजनेताओं को भी अपनी ओर खींचता है। आज देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस व भाजपा के लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक बड़े चेहरे क्रिकेट बोर्ड के विभिन्न मलाईदार पदों पर काबिज हैं। ये राजनेता क्रिकेट बोर्ड में अर्से से राजनीति कर रहे हैं और अपने रसूख व जोड़-तोड़ से लगातार विभिन्न क्रिकेट संघों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। कहने को क्रिकेट बोर्ड की तरफ से इन्हें वेतन तो नहीं मिलता पर इनके जलवे देखने लायक होते हैं। हर कोई मुंह बाये रहता है बोर्ड पर कब्जे के लिए। हर तोड़-तिकड़म आजमाये जाते हैं। हर राजनीतिक, राजनीति से ज्यादा समय क्रिकेट को देने के लिए उत्सुक रहता है। चाहे वह कृषिमंत्री शरद पवार हों या फिर भाजपा के चमकते सितारे  अरुण जेटली। बढ़ती मंहगाई और देश में अकाल की स्थिति के दौरान भी केंद्रीय कृषिमंत्री क्रिकेट के लिए वक्त निकाल ही लेते हैं। अगर राज्यसभा में विरोधी दल के नेता अरुण जेटली की बात की जाए तो वह भी क्रिकेट के व्यामोह से खुद को दूर रख पाने में अपने को अक्षम पाते हैं। वह पार्टी के संकटमोचक के रूप में इन दिनों खासी चर्चा बटोर रहे हैं। बावजूद इसके क्रिकेट का लोभ ऐसा है कि संभाले नहीं संभलता। आज क्रिकेट में बस पैसा ही पैसा है। लाखों या करोड़ों की नहीं, हजारों करोड़ की बात हो रही है। हजार करोड़ रुपये का तो सट्टा लगने लगा है। क्रिकेट में राजनेताओं को दौलत के अतिरिक्त जो चीज सबसे ज्यादा लुभाती है वह है सेक्स और शराब। दुर्भाग्यवश आईपीएल की पहचान सेक्स, शराब और दौलत बनता जा रहा है। इसी के साथ कोढ़ में खाज यह कि राजनेताओं के इसमें हद से अधिक दिलचस्पी लेने की वजह से यह राजनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है।
आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग लोगों की नजर में इंडियन पालिटिक्स लीग या इंडियन पॉवर लीग बनता जा रहा है। शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने तो इसे इंडियन पियक्कड़ लीग का संबोधन दे डाला है। दरअसल  शराब व शबाब के ग्लैमर से परिपूर्ण क्रिकेट फुल मस्ती उपलब्ध करा रहा है। आईपीएल में कालाधन लगे होने के भी आरोप लगातार लगते रहे हैं।  एक के बाद एक लगातार आईपीएल के दामन पर दाग लगते जा रहे हैं। खेल पर सट्टे का खुलासा, वानखेड़े में शाहरुख कांड और अब एक खिलाड़ी पर सबसे घिनौना दाग। अब तो खुद खेल मंत्री ने भी कह दिया है कि आईपीएल के खेल में काले धन के इस्तेमाल का बड़ा शक है। जाहिर है आईपीएल के वजूद पर सवाल तो उठते ही हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस डर्टी गेम को खत्म कर देना चाहिए। हर हलके से एक सुर में आवाज उठने लगी है कि क्रिकेट के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को बंद करो। यह खेल सेक्स, दौलत और राजनीति यानी तीन का तड़का बन गया है।
 नई प्रतिभाओं को पहचान देने के नेक उद्देश्य से शुरू हुआ आईपीएल आज इस स्थिति में पहुंच गया है कि इस पर पाबंदी लगाये जाने की मांग उठने लगी है। पूर्व क्रिकेटर व भारतीय जनता पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद तो इस पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन भी कर चुके हैं। इसी के साथ उन्होंने संसद में भी इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि वैचारिक रूप से उनके धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव ने भी उनका इस मुद्दे पर समर्थन किया। वहीं क्रिकेट में राजनेताओं की बढ़ती राजनीति पर चिंता जताते हुए खुद खेल मंत्री अजय माकन भी इसे शुभ संकेत नहीं मानते। उन्होंने कहा है कि राजनेताओं को खेल संघों से दूर ही रहना चाहिए। जबकि खेल के नाम पर हो रहे खिलवाड़ पर लालू प्रसाद यादव ने भी अपना विरोध जता दिया है। इस सबको देखते हुए समाज के विभिन्न वर्गों से आईपीएल पर रोक लगाने की मांग भी उठने लगी है। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि आईपीएल की आड़ में काले धन का खेल चल रहा है। अगर आईपीएल को जारी भी रखना है तो इससे राजनेताओं और बॉलीवुड कलाकारों को दूर करने की जरूरत है। जनता पार्टी के अध्यक्ष कहते हैं कि यह क्रिकेट का डर्टी गेम है। इसे फौरन बंद होना चाहिए। जाहिर है, आईपीएल पर सवाल उठे हैं और जवाब उसी के अफसरों को देना होगा। लेकिन हर विवाद पर कन्नी काट जाते हैं आईपीएल के कमिश्नर राजीव शुक्ला।
यह सचमुच ही दुखद है कि कृषिमंत्री को कर्ज तले दबे किसानों की आत्महत्या या फिर गोदामों के अभाव में सड़ते गेहूं और अन्य खाद्दान्न उतने विचलित नहीं करते जितनी चिंता उन्हें क्रिकेट की रहती है। भले ही देश के कुछ भागों में लोग भूखे मर रहे हों। इससे भी उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वे इन फालतू की चीजों में माथापच्ची करने के बजाय क्रिकेट में रुचि लेना ज्यादा पसंद करते हैं। यहां तक कि उनके खुद के गृहराज्य महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में कर्ज तले दबे किसान अपनी इहलीला समाप्त करते जा रहे हैं। बावजूद इसके किसानों की दशा सुधारने, उनके लिए कुछ करने की बजाय वह क्रिकेट की राजनीति में ही ज्यादा उलझे रहते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिरकार ऐसा क्या है क्रिकेट में कि लोग जिस काम को करने के लिए अधिकृत हैं वह अपने कर्तव्य से विमुख होकर क्रिकेट के पीछे मरे जा रहे हैं। अभी पिछले दिनों मुंबई क्रिकेट संघ के चुनाव में विलासराव ने जीत दर्ज की। चूंकि  शरद पवार आईसीसी के सर्वेसर्वा होने के कारण मुंबई क्रिकेट संघ का चुनाव तकनीकी रूप से नहीं लड़ सकते थे। इसलिए अपने छाया उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने विलासराव देशमुख को यह चुनाव लड़वाया था। इस तरह एक और राजनेता का क्रिकेट की राजनीति में पदार्पण हो गया।  वैसे तो इस पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है और न ही ऐसा कोई नियम ही है कि नेता किसी सोसाइटी या निजी संस्था में पद नहीं संभाल सकते। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि क्रिकेट बोर्ड किसी भी पदाधिकारी को वेतन नहीं देता। फिर भी शरद पवार, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी व राजीव शुक्ला जैसे व्यस्त राजनेता अपना अच्छा-खासा समय बोर्ड को देते हैं। वेतन नहीं मिलता फिर भी इन नेताओं/पदाधिकारियों के फाइव स्टार होटलों की बैठकों में लाखों रुपये रोज खर्च किए जाते हैं। वर्तमान में सरकार के तीन मुख्यमंत्री बोर्ड से जुड़ हुए हैं। शरद पवार आइसीसी के चेयरमैन भी हैं व दुबई दफ्तर से क्रिकेट पर नियंत्रण बनाए हुए हैं। दिल्ली में मंत्रालय का कामकाज देखने की बजाय मुंबई की क्रिकेट राजनीति में उनकी दिलचस्पी ज्यादा रहती है। राजीव शुक्ला का काम ही क्रिकेट विवादों को निपटाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह देश के साथ धोखा नहीं है कि सरकार के वरिष्ठ मंत्री मंत्रालयों का कामकाज करने के बजाय क्रिकेट की राजनीति में ज्यादा मशगूल हैं। यह वाकई बहस का विषय है। इसमें कोई शक नहीं है कि ये राजनेता/पदाधिकारी भारतीय क्रिकेट को पूरी तरह नियंत्रित किए हुए हैं। आरोप तो यहां तक लगाये जा रहे हैं कि दरअसल नेताओं की नजर बोर्ड की अकूत कमाई पर लगी रहती है। वे इस पर कब्जा जमाकर अपनी-अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना चाहते हैं।
 पिछले एक दशक में बोर्ड ने तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की आय की है। आइपीएल में हुए एक हजार करोड़ रुपये का घोटाला भले ही दब गया, लेकिन सच्चाई यह है कि शरद पवार उस समय बीसीसीआइ को अपने हिसाब से चला रहे थे। फ्रेंचाइजीधारक आइपीएल खरीदने में काला धन लगा रहे हैं। ललित मोदी, पवार के इशारों पर ही आइपीएल की फ्रेंचाइजी बांट रहे थे। जब घोटाला पकड़ में आया तो मोदी को कसूरवार मानकर ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया गया। कुल मिलाकर क्रिकेट बोर्ड में नेताओं की भागीदारी ने जितना इस खेल का सत्यानाश किया है। उतना किसी ने भी नहीं किया है।

क्या कहते हैं खेल मंत्री
 केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन का मानना है कि राजनेताओं को क्रिकेट से दूर रहना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या यह बात आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला जैसे उनकी पार्टी के नेताओं के पर भी लागू होती है।
 उन्होंने कहा 'मेरे साथियों समेत सभी राजनेताओं को क्रिकेट के संचालन से दूर रहना चाहिए। खेल का संचालन उन लोगों को करना चाहिए जो उसके बारे में जानकारी रखते हों और जिनमें प्रबंधन की क्षमता हो।Ó माकन ने कहा 'वे लोग जो क्रिकेट के बारे में कुछ नहीं जानते, जिन्हें बल्ला पकडऩा तक नहीं आता। उनके लिए अच्छा है कि वह क्रिकेट से न जुड़ें।Ó इंडियन प्रीमियर लीग में स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे के बारे में उन्होंने कहा 'मैंने पहले भी कहा है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड 'बीसीसीआईÓ को इस मामले की तह तक जाना होगा। उनके अनुसार यह मामला एक बड़ी चुनौती होने के साथ-साथ एक ऐसा मौका भी है जिससे बीसीसीआई को इस खेल में मैच फिक्सिंग का सफाया करने में मदद मिलेगी। उसे जल्द से जल्द यह मुद्दा सुलझा लेना चाहिए।Ó उन्होंने कहा कि 'केवल पांच खिलाडिय़ों को निलंबित करने से कुछ नहीं होगा। बीसीसीआई को इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान निकालना होगा।Ó

बाक्स आइटम

क्रिकेट के गुड़ पर भिनभिनाने वाले राजनेताओं की फेहरिस्त लंबी है। इनमें से कुछ का ब्यौरा : शरद पवार (आईसीसी के चेयरमैन), राजीव शुक्ला (उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ व आईपीएल कमिश्नर ), यशवंत सिन्हा (टेनिस), विजय मल्होत्रा (तीरंदाजी), जगदीश टायटलर (जुडो), अरुण जेटली (दिल्ली क्रिकेट संघ), नरेंद्र मोदी (गुजरात क्रिकेट संघ), रमन सिंह (छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ), अनुराग ठाकुर ( हिमाचल क्रिकेट, ओलंपिक संघ ) सुरेश कलमाड़ी (ओलंपिक), प्रफुल्ल पटेल (फुटबाल), विलासराव देशमुख (मुंबई क्रिकेट संघ ), ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ ), फारूख अब्दुल्ला (जम्मू एवं कश्मीर क्रिकेट संघ ),सुखदेव सिंह ढींढसा (पंजाब ओलंपिक संघ), रोकबुल हुसैन (असम ओलंपिक संघ ),  अभय सिंह चौटाला (बॉक्सिंग), अखिलेश दास (बैडमिंटन, उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ), बिरेन्द्र प्रताप वैश्य (वेटलिफ्टिंग), तरुण गोगोई (असम क्रिकेट संघ), जे पी नद्दा ( हिमाचल ओलंपिक संघ), रमेश मेंडोला (मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ ), बिजोय कोइजम (मणिपुर ओलंपिक संघ), लाल थांह्वाला (मिजोरम ओलंपिक संघ), नेइफिउ रिओ (नागालैंड ओलंपिक संघ), समीर डे (उड़ीसा ओलंपिक संघ), सी पी जोशी (राजस्थान क्रिकेट संघ ), दयानंद नार्वेकर (गोवा क्रिकेट संघ) आदि। इनके अलावा पंजाब के आई एस बिंद्रा, विदर्भ के प्रकाश दीक्षित, सौराष्ट्र के भारत शाह, बंगाल के जगमोहन डालमिया, केरल के टी आर बालाकृष्णन, झारखंड के अमिताभ चौधरी, आंध्र प्रदेश के डी वी सुब्बाराव समेत सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी किसी राज्य या राष्ट्रीय स्तर का कोई भी खेल नहीं खेला है सिवाय खेल संघों में बैठ कर खेल से खिलवाड़ करने के।
बीसीसीआई में काबिज एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला, अरुण जेटली जैसे लोगों के पास और देश के विकास से संबंधित और भी कई काम है मसलन वकालत, उद्योग, देशवासियों का विकास वगैरह, वगैरह। पूर्व क्रिकेटर जो सन्यास के बाद खाली बैठे हैं वो इस खेल को इन राजनेताओं की अपेक्षा कहीं बेहतर ढंग से समझते भी हैं और भारतीय क्रिकेट को ज्यादा समय भी  दे सकते हैं। वे क्रिकेट को रुपया बनाने की मशीनरी बनाने की जगह खेल में सुधार कर कहीं बेहतर योगदान दे सकते हैं।
                             

बीजेपी से बिदक रहे बाबा


एजेंडा

बीजेपी से बिदक रहे बाबा ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका 'इतवार' में प्रकाशित )

इंट्रो : मुस्लिमों व दलित इसाइयों को आरक्षण देने की वकालत कर बाबा रामदेव ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। उनके इस बयान के गहरे मायने हैं
 हाईलाइटर :
क्या बाबा रामदेव बीजेपी से पिंड छुड़ा रहे हैं। यह सवाल इन दिनों बड़े जोर शोर से उठाया जा रहा है। यह सवाल इसलिए उछाला जा रहा है कि हाल फिलहाल उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित मुसलमानों की एक सभा में खुद को सबसे बड़ा मुस्लिम पैरोकार घोषित किया। बीजेपी व आरएसएस की नीतियों से उलट उन्होंने मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग का समर्थन ही नहीं किया बल्कि संविधान में संशोधन की भी मांग कर डाली। हालांकि, अभी तक बाबा बीजेपी के ही सुर में सुर मिलाकर बोल रहे थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तराखंड में बीजेपी को वोट देने की अपील भी की थी। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि बाबा बीजेपी से कन्नी काट रहे हैं। दरअसल, इस बहाने बाबा रामदेव अपना आधार बढ़ाना चाह रहे हैं। उन्हें एकमुश्त पडऩे वाले मुस्लिम वोटों के रूप में लहलहाती फसल लुभा रही है। वह इसे आगामी चुनाव में काटना चाहते हैं। यही कारण है कि उनके सुर बीजेपी से अलग सुनाई दे रहे हैं। उनकी इस उलटबांसी को इस रूप में भी कहा जा सकता है कि वह भी राजनीतिज्ञों की भाषा बोलना सीख गये हैं। कब, कहां क्या और कितना बोलना है। इसका बखूबी अंदाजा उन्हें हो गया है। उस कार्यक्रम में शिरकत करते हुए बाबा रामदेव ने जो कुछ कहा उससे तो यही आभास हो रहा है कि वह बीजेपी से बिदकने लगे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ उनकी चाल बता रहे हैं। वह मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग कर खुद को बीजेपी व आरएसएस से अलग दिखाना चाहते हैं। इसमें वह कितना कामयाब होते हैं यह तो समय ही बतायेगा। परन्तु राजनीतिक पंडितों का कहना है कि दो नाव पर सवारी करने की सोच रहे बाबा कहीं बीच भंवर में डूब ही न जाये। यानी मुसलमान वोटों की चाह में कहीं उनके समर्थक ही न बिदक जायें। और वही हाल हो कि न खुदा ही मिला न विशाले सनम।
 कांग्रेस के स्वनामधन्य महासचिव दिग्गीराजा उर्फ दिग्विजय सिंह योगगुरु पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह आरएसएस के एजेंडे पर काम कर रहे हैं।
चूंकि काले धन के मुद्दे पर आंदोलन छेडऩे वाले बाबा भी भारत स्वाभिमान मंच के नाम से संगठन बनाकर राजनीतिक रण में कूद चुके हैं और उन्हें भी वोटों की फसल काटनी है। इसलिए मुस्लिम वोटों की चाह में वे खुद को बीजेपी व आरएसएस से अलग साबित करने में जी जान से जुटे हैं। रामदेव को जानने वालों का दावा है कि भीड़ देखकर बहक जायें इतने कच्चे नहीं हैं वह। उनकी हर बात सोची समझी होती है। दरअसल, वह अपनी छवि हिंदू संत से बदलकर सर्वमान्य बनाना चाहते हंै। अभी तक उनकी छवि हिंदुत्व वाली रही है। हालांकि उन्होंने आरएसएस या बजरंग दल की तरह कट्टर हिंदुवाद की बात कभी नहीं की। किंतु भगवा चोला धारी व साध्वी ऋतंभरा आदि के साथ घनिष्ठता की वजह से उन पर यह आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस तो बार बार उन पर आरएसएस की गोद में खेलने का आरोप लगाती रही है। पिछले साल दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव के अनशन स्थल पर साध्वी ऋतंभरा की मौजूदगी को आधार बनाकर कांग्रेस की ओर से दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहराया गया था। गौरतलब है कि अनशनस्थल से बाबा को महिलाओं के कपड़े पहनकर वहां से भागना पड़ा था। इस पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे जान से मार देने की साजिश की गई थी। इसलिए मुझे महिलाओं के कपड़े पहनकर जान बचानी पड़ी। बहरहाल उस घटना के बाद अपनी साख गंवा बैठे बाबा रामदेव एक बार फिर पूरे दमखम के साथ ताल ठोंक रहे हैं। और कांग्रेस को गरियाने का एक भी मौका नहीं चूकते हैं। अभी पिछले दिनों ही उन्होंने सांसदों पर हमला बोलते हुए कह दिया था कि पूरी संसद बीमार है। इस पर बावेला मचना ही था। सो मचा भी। लालू प्रसाद यादव समेत कई अन्य सांसदों ने बाबा को मानसिक रोगी करार दिया। लालू ने तो अपने ठेठ अंदाज में यहां तक कह दिया कि बाबा पगलेटई करने लगे हैं। जानकारों का मानना है कि बाबा के ये बयान मीडिया की सुर्खियों में बने रहने का उनका फंडा है। वे अक्सर काले धन को लेकर कांग्रेस पर आक्रामक होते रहे हैं। रामलीला मैदान वाली घटना के बाद तो वह पूरी तरह से कांग्रेस को काट खाने को तैयार रहते हैं। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि आने वाले चुनाव में वह देश के सभी लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। इसके लिए भारत स्वाभिमान के बैनर तले वह कालाधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण के क्रम में देश भ्रमण पर हैं। उनका मुसलमानों के आरक्षण की वकालत करना आरएसएस से खुद को अलग दिखाने की सोची समझी रणनीति है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक के एजेंडे पर काम करने के लगने वाले आरोपों का तोड़ उन्होंने इस रूप में निकाला है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धर्म के आधार पर आरक्षण की खिलाफत करता रहा है। जबकि योगगुरु ने मुस्लिमों के साथ दलित ईसाइयों को भी आरक्षण देने की वकालत कर ठीक उसके उलट काम किया है।
 बाबा रामदेव को जानने वालों का दावा है कि बाबा कोई भी काम बगैर सोचे समझे नहीं करते। हर बात को बोलने से पहले उसके लाभ हानि का गुणा भाग कर लेते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय राजधानी में उनके दिये गये इस बयान के बड़े गहरे अर्थ हैं। एक तो इससे उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर काम करने के आरोप से छुटकारा मिल जायेगा और दूसरा यह कि लगे हाथ एकमुश्त मुस्लिम वोटों पर दावेदारी भी तय हो जायेगी। दरअसल योगगुरु मुसलमानों व इसाइयों के सबसे बड़े खैरख्वाह का तमगा हासिल करना चाहते हैं। इसीलिये इस तरह के विवादित बयान दे रहे हैं। वैसे तो विवादित बयान देने में योगगुरु का कोई सानी नहीं है। बहरहाल स्वामी रामदेव से मौलाना रामदेव बनने की ओर उन्होंने कदम बढ़ा कर जहां मुस्लिम वोटों पर अपनी दावेदारी जताई है, वहीं बीजेपी को भी संकेत दे दिया है कि अब वह अपनी राह अलग बनायेंगे। हालांकि कुछ लोगों की राय में बाबा बहक रहे हैं। यदि समय रहते वे सचेत नहीं हुए तो उनका हश्र भी वही होगा, जो उनके पूर्ववर्ती संतों की राजनीतिक पार्टियों का हुआ। चाहे वह महेश योगी रहे हों या फिर जय गुरुदेव। इन बाबाओं के भी कम अनुयायी नहीं थे। महेश योगी ने जहां भगवान राम के नाम की मुद्रा चला दी, वहीं जय गुरुदेव ने अपने करोड़ों अनुयायियों को टाट का वस्त्र ही पहना दिया। बावजूद इसके ये बाबा लोग राजनीति के मैदान पर फिसड्डी ही साबित हुए।
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन से खुद को अलग दिखाने के फेर में स्वामी रामदेव मुस्लिम आरक्षण की वकालत की हो। किंतु इससे उनके समर्थक बिदक सकते हैं। एक तरफ जहां आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को आरक्षण देने की बात की जा रही है ऐसे में बाबा का धर्म के आधार पर आरक्षण की वकालत करना उनके लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
 दरअसल, बाबा रामदेव ने मुस्लिम समुदाय से जुडऩे की अब तक की सबसे बड़ी पहल करते हुए दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में मुस्लिम नेताओं के साथ मंच साझा किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि वो अपनी अगली रैलियों में मुस्लिमों के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाएंगे। रामदेव ने कहा, यदि तुम्हारे मौलाना तुम्हारी आवाज नहीं उठा सकते तो ये बाबा तुम्हारी आवाज उठाएगा। कांफ्रेंस में बोलते हुए रामदेव ने अनुसूचित जातियों के आरक्षण में पिछड़े मुस्लमानों को भी हिस्सा देने की वकालत की। रामदेव ने यह भी कहा कि वह सरकार में मुसलमानों की ज्यादा भागीदारी की भी मांग करेंगे। इस मौके पर रामदेव ने मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए संविधान में संशोधन की मांग का समर्थन भी किया। उन्होंने कहा कि धारा 341 का मामला केवल किसी एक समुदाय का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश का मामला है। ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा की तरफ से बुलाये गये इस खास सम्मेलन को नाम दिया गया था मुसलमानों के बीच बाबा रामदेव।
रामदेव ने कहा, लोग कहते हैं कि मैं योग गुरु हूं, भगवा चोला पहनता हूं और मुसलमानों के मुद्दों में यकीन नहीं रखता, जो ऐसा कहते हैं वो पतंजलि योगपीठ आकर देखें, वहां तीन हजार मुस्लिम युवा काम करते हैं। वहां हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं है। वहां कोई धर्म नहीं है, कोई पार्टी नहीं और ना ही कोई मंदिर या मस्जिद।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों के विषय में बात करने वाला संविधान का अनुच्छेद 341 मुस्लिम और ईसाई दलितों की बात नहीं करता है। यह अन्याय है और इसमें बदलाव होना चाहिए। सभी दलितों के बराबर हक होने चाहिए। इसके लिए संघर्ष करने वालों के साथ मैं भी दिल से साथ हूं। योग गुरु ने कहा कि वे अपने आंदोलन में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। यही वजह है कि चार जून को दिल्ली में होने वाले अनशन के दौरान उर्दू में भी पोस्टर बैनर लगाए जाएंगे।
हम अपने मुसलमान भाईयों और बहनों के साथ हैं. मेरे आश्रम में तीन हज़ार मुसलमान हैं. वहां कोई धर्म नहीं है, कोई पार्टी नहीं और ना ही कोई मंदिर या मस्जिद। मुसलमानों के मूल अधिकारों के बारे में ध्यान ना देने पर सरकार की आलोचना करते हुए रामदेव ने कहा कि अल्पसंख्यकों के प्रति उनका जज्बा नया नहीं है। बाबा के इस बयान को बीजेपी से कन्नी काटने के रूप में देखा जा रहा है। सम्मेलन में बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं के साथ बाबा रामदेव को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। इस मौके पर बाबा रामदेव ने एलान किया कि अब वह मुसलमानों की आरक्षण की लड़ाई भी लड़ेंगे। रामदेव ने कहा मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 341 में संशोधन जरूरी है। अपने लंबे चौड़े भाषण के अंत में बाबा रामदेव ने मुसलमानों को देश भक्ति का पाठ भी पढ़ाया और कहा कि अब नफरत की दीवार गिराने का वक्त आ गया है।
वैसे एक सच्चाई यह भी है कि विधानसभा चुनाव में रामदेव ने उत्तराखंड में बीजेपी को वोट देने की अपील की थी किंतु उनकी यह अपील किसी काम न आई। बीजेपी को वहां हार का मुंह देखना पड़ा। ऐसे में कहा जा रहा है कि बाबा के योग शिविरों में भले ही हजारों की भीड़ उमड़ती है लेकिन यह वोट में तब्दील होगी यह दावा नहीं किया जा सकता।
  बद्रीनाथ वर्मा

साधु + सियासत =फिसड्डी


साधु + सियासत =फिसड्डी (राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

योग के बलबूते विश्वविख्यात हुए बाबा रामदेव के शिविरों में जुटती भीड़ ने बाबा रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जगा दिया। और अपने तीखे बयानों से मीडिया की लाइम लाइट में बने रहने में सिद्धहस्त बाबा बाकायदा भारत स्वाभिमान के नाम से एक संगठन बनाकर राजनीतिक अखाड़े में उतर चुके हैं। इससे जहां राजनीतिक हलकों में बेचैनी  है, वहीं दूसरी ओर खुद बाबा के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
वैसे अगर अतीत को आधार बनाया जाय तो उनसे पहले भी कुछ संतों ने राजनीतिक पारी खेलने की भरपूर कोशिश की। यह बात अलग है कि उनकी उम्मीदें परवान नहीं चढ़ पाई। जनता ने चुनावी मैदान में उन्हें टिकने नहीं दिया। दरअसल, जब तक संत आध्यात्मिक क्रियाकलापों तक सीमित रहे तब तक तो जनता ने उन्हें पलकों पर बिठाकर रखा किन्तु जैसे ही भीड़ देखकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागी लोगों ने उन्हें नकार दिया। अध्यात्म के बल पर भक्तों के दिलों पर राज करने वाले संत मतदाताओं के दिल में जगह बना पाने में बिल्कुल ही फिसड्डी साबित हुए।
कई धर्मगुरुओं ने अलग अलग समय पर अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। उम्मीदवार उतारा। चुनाव लड़ाया। और फिर बियाबान में खो गये। आजादी के बाद अखिल भारतीय राम राज्य परिषद से लेकर दूरदर्शी पार्टी व अजेय भारत पार्टी तक ऐसे कई दल बने जो मतदाताओं के मन पर कोई छाप छोड़े बगैर एक-दो दशक में राजनीतिक मानचित्र से गायब हो गये। बाबाओं की बनाई अब तक की सबसे कामयाब पार्टी थी अखिल भारतीय राम राज्य परिषद। आजादी के तत्काल बाद बनी इस पार्टी के संस्थापक प्रख्यात संत स्वामी करपात्री जी महाराज थे। इस पार्टी ने 1952 के चुनाव में तीन लोकसभा सीटें और 1962 में दो लोकसभा सीटें जीतीं। कुछ राज्यों में विधान सभा सीटें भी मिलीं मगर अंत में इसका हश्र भी वही हुआ। पार्टी अखिल भारतीय जनसंघ में तिरोहित हो गई।
वैसे अभी से यह कहना जल्दबाजी होगी कि बाबा रामदेव का हश्र भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही होगा। आइए कुछ ऐसे ही बाबाओं व उनकी पार्टियों से आपको रूबरू कराते हैं।
इस श्रृंखला में सबसे पहला नाम है करपात्री जी महाराज का। उन्होंने रामराज्य परिषद नामक पार्टी बनाई। उनकी पार्टी कई चुनावों में उम्मीदवार भी उतारती रही। कुछ सीटें जीती भी। बाद में राम राज्य परिषद राजनीतिक पटल से ओझल हो गई। इसी तरह से धूमकेतु की तरह चमके बाबा जयगुरुदेव का किस्सा सबसे मजेदार है। सत्तर के दशक में पूरे उत्तर भारत में जय गुरुदेव की धूम थी। खुद तो झक सफेद मलमल से सजे रहते थे बाबा पर उनके भक्त टाट के कपड़े पहनते थे। सादा जीवन उच्च विचार पर अमल करते हुए गली-गली गांव-गांव लिखते घूमते थे जयगुरुदेव, सतयुग आएगा। उनके भक्तों का एक और प्रिय नारा था-जो अंडा, मछली खायेगा, सन् अस्सी तक मर जायेगा। खैर सन् 1980 तक सारे के सारे मांसाहारी मर गये, इसका प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। उनके समागमों में भक्तों की जुटती भीड़ देख जयगुरुदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने उड़ान भरना शुरू कर दिया। परिणाम हुआ सन् 1980 में दूरदर्शी पार्टी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में कूद पड़े। कई चुनावों में परास्त होने के बाद उनकी पार्टी अब दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। राजनीति से तौबा कर चुके बाबा अब मथुरा में रह रहे हैं।
तीसरे और महत्वपूर्ण ग्लोबल संत महेश योगी हैं। उन्होंने भी भारत अजेय पार्टी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में दो दो हाथ करने की कोशिश की। परन्तु एक बार सिर्फ एक सांसद बनाने के अलावा उनकी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई। कई चुनावों में पराजय के बाद आखिरकार अजेय भारत पार्टी भी बेमौत मर गई।
करपात्री जी का राम राज्य परिषद
देश को आजादी मिलने के बाद पहली बार 1951 में लोकसभा चुनाव हुए। इस आम चुनाव में कुल 53 दलों ने भाग लिया। इसमें एक राम राज्य परिषद भी थी। इस पार्टी की स्थापना स्वामी करपात्रीजी महाराज ने 1948 में की थी। उस चुनाव में राम राज्य परिषद पार्टी ने 61 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये जिनमें से 36 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। हालांकि तीन लोग जीत कर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे। यह तीनों सीटें पार्टी को राजस्थान में मिली। जिन लोगों ने राम राज्य परिषद के टिकट पर जीत दर्ज की। वे थे भीलवाड़ा से हरिराम, सीकर से नंदलाल तथा कोटाबूंदी से चंद्रसेन। पार्टी को इस चुनाव में कुल 20.98 लाख वोट मिले। 1952 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद ने 95 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए जिसमें केवल एक सीट हासिल हुई। इस चुनाव में उसे कुल 1.74 फीसदी वोट हासिल हुए थे। इसके बाद 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव हुए। राम राज्य परिषद ने चार राज्यों की 15 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। पर एक भी प्रत्याशी नहीं जीत सका। उल्टे 11 सीटों पर परिषद प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। मतों में भी भारी गिरावट आई। उसे इस चुनाव में सिर्फ 4.60 लाख मत मिले। 1962 में तीसरी लोकसभा के चुनाव में फिर एक बार उसने छह राज्यों की 40 लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। इनमें से 33 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी। मात्र दो सीटें- एक राजस्थान में बाड़मेर से तान सिंह तथा दूसरी एमपी में रायगढ़ से राजा विजय भूषण सिंह देव ही जीत सके। इसी के साथ पार्टी ने कुछ विधानसभा सीटों पर भी जीत हासिल की थी। बाद के चुनावों में पार्टी की भागीदारी छिटपुट रही। 1980 के चुनाव में इसने 4 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और सबकी जमानत जब्त हो गई। इसे कुल 2120 वोट ही मिले। बाद में करपात्री जी की यह पार्टी राजनीतिक नक्शे से ही गायब हो गई।
जयगुरुदेव की दूरदर्शी पार्टी
 बाबा जयगुरुदेव भी भक्तों का सैलाब देख बहक गये थे। स्वयं मलमल के झक सफेद वस्त्रों से सुसज्जित बाबा ने कलयुग जायेगा, सतयुग आयेगा के नारे के साथ अपने भक्तों को टाट पहना दिया। भक्तों की भीड़ से उत्साहित बाबा जयगुरुदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने जोर मारा और वे भी एक राजनीतिक पार्टी बना बैठे। सन् 1980 में गठित उनकी पार्टी का नाम दूरदर्शी पार्टी रखा गया। इसकी स्थापना अहमदाबाद में हुई। उनकी पार्टी का घोषणापत्र सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान के लक्ष्य पर आधारित था। उन्होंने लोकतंत्र में कम मतदान का सवाल उठाया। उनका तर्क भी दमदार था क्योंकि औसतन पचास से साठ प्रतिशत लोग ही चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। बाबा ने बाकायदा गुणाभाग करके यह भी पता लगाया कि मतदान केन्द्रों की संख्या मतदाताओं की संख्या के लिहाज से इतना कम होती है कि सारे मतदाता निर्धारित समय में वोट डाल ही नहीं पाते। बहरहाल दूरदर्शी पार्टी ने वादों का तरकश तैयार करके यूपी के विधानसभा चुनावों में अपने तीन सौ प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। पर एक भी सीट जीतना तो दूर कोई भी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया। हालांकि कुछ वोट जरूर बटोरे। दूरदर्शी पार्टी ने 1984 के आम चुनाव में  चुनाव प्रक्रिया, कराधान और प्रशासन की प्रक्रिया में बदलाव का मुद्दा उठाया। उसने दो राज्यों में  97 उम्मीदवार खड़े किये पर इनमें से एक भी प्रत्याशी की जमानत नहीं बच पाई। पार्टी को कुल पांच लाख वोट मिले जो कुल मतों का मात्र 0.2 फीसदी रहा। 1989 में इस पार्टी ने कुल 288 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें इसे कुल 0.45 प्रतिशत वोट मिले। इसी चुनाव में यूपी में इस पार्टी ने 85 में से 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। हालांकि इसे कुल पांच लाख चार हजार तीन सौ चौरासी वोटों से ही संतोष करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनाव में 321 सीटों पर लड़ी दूरदर्शी पार्टी को कुल 0.17 फीसदी ही वोट मिले। कई बार चुनाव लडऩे के बावजूद खाता खोलने में नाकाम रहने के चलते बाबा की इस पार्टी ने 1997 में चुनाव प्रक्रिया से नाता तोड़ लिया। उसी दौरान का एक वाकया है। जयगुरुदेव ने एक ऐसा नाटक किया जिससे उनकी बची खुची साख भी मिट्टी में मिल गई। दरअसल जयगुरुदेव ने ऐलान किया कि वह कानपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जनता के सामने लेकर आएंगे। मिथक बन चुके नेताजी को साक्षात देखने के लिए नियत तिथि को जनता की भारी भीड़ जुटी। लेकिन जब जयगुरुदेव सामने आए तो अकेले थे और उन्होंने खुद को ही सुभाष चंद्र बोस कह दिया। इसके बाद गुस्साई जनता ने जो उन पर जूते चप्पल बरसाये कि फिर वे इससे उबर नहीं पाये। और इस तरह मानो जयगुरुदेव की श्री ही जैसे चली गई।
महर्षि की अजेय भारत पार्टी
अस्सी के दशक में योगगुरु के रूप में चर्चित हुए महर्षि महेश योगी ने भी  अपनी एक राजनीतिक पार्टी अजेय भारत पार्टी बनाई थी। उनके भावातीत ध्यान योग ने भी उस समय बाबा रामदेव के प्राणायाम की तरह ही अपनी धूम मचाई थी। देश भर में उन्होंने योग शिक्षकों और आयुर्वेदिक चिकित्सकों का जाल भावातीत ध्यान के जरिये फैलाया था। उस समय पचास से अधिक देशों में महर्षि के 250 टीएम सेंटर खुल गये थे। यहां तक कि उन्होंने भगवान श्रीराम के नाम पर मुद्रा भी चलाया था। देश और विदेश में उन्होंने महर्षि आयुर्वेद के उत्पादों को एक भरोसेमंद ब्रांड बना डाला और जीवन के उत्तरार्ध में हालैंड में जा बसे। हालैंड से ही अचानक टीवी चैनलों के माध्यम से महर्षि महेश योगी ने देश की चुनाव पक्रिया और नेताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिये। अपने तीस लाख डालर के साम्राज्य की बदौलत वह भी साल 1992 में एक अंतरराष्ट्रीय नेचुरल लॉ पार्टी बनाकर राजनीतिक पारी खेलने के लिए मैदान में आ गये। भारत में इसकी ब्रांच थी अजेय भारत पार्टी। मगर अजेय भारत पार्टी एक चुनाव में बस एक ही उम्मीदवार को संसद तक भेज पाई। उनकी पार्टी का एजेंडा विश्व की राजनीति से कंगालों की सफाई करने का था। इसके पीछे उनका तर्क था कि समाज के संपन्न वर्ग के लोगों को ही राजनीति में आना चाहिये। गरीब नेता लोकसभा में भी पहुंच कर देश का कल्याण नहीं कर सकते। वह इसे पेशा समझ कर खाने कमाने में मशगूल हो जातेे हैं। संपन्न लोग लोकसभा, विधानसभाओं में पहुंचेंगे तो जनता को कुछ दे पाने की हैसियत में होंगे। पर अपने योग से दिलों पर राज कर रहे महेश योगी की राजनीतिक पारी बुरी तरह फ्लॉप रही। अपने अंतिम दिनों में भारत के 98 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने राजनीति के आंगन में हाथ आजमाने का प्रयास किया पर जनता ने उनके आयुर्वेद को तो दिल से अपनाया पर उनकी पार्टी का नोटिस ही नहीं लिया। 2004 में यह पार्टी अपनी मौत मर गई।
उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी
अयोध्या आंदोलन से निकली फायरबं्राड नेता उमा भारती ने भी अपनी एक अलग पार्टी बनाई थी। भारतीय जनशक्ति पार्टी। किंतु वे कुछ खास नहीं कर पाईं। यहां तक कि अपनी पार्टी के दर्जन भर उम्मीदवारों को भी नहीं जिता सकीं। थक हारकर वे फिर भाजपा में वापस लौट आईं। उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा। हालांकि यहां भी वे कोई चमत्कार नहीं दिखा पाईं।
                                                                                        बद्रीनाथ वर्मा  9718389836

सब्जबाग के एक साल


                   सब्जबाग के एक साल (राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)
इंट्रो : पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुए ममता बनर्जी को 20 मई को एक साल पूरे हो गये। इस दौरान उनके कितने वादे पूरे हुए और कितने हवा हवाई साबित हुए। एक लेखाजोखा

पोरिबर्तन (परिवर्तन) की हांक लगाकर माकपा के अभेद्य दुर्ग को ढहा देने वाली ममता बनर्जी सरकार के 20 मई को एक साल पूरे हो गये। चुनाव प्रचार के दौरान उनका दिया गया नारा 'बदला नय, बदल चाईÓ (बदला नहीं, बदलाव चाहिए) को जनता ने हाथोंहाथ लिया था। माकपा कैडरों के दंभ को तोडऩे के लिए राज्य की जनता ने पूरे विश्वास के साथ राज्य की बागडोर उन्हें सौंप दी। सिर्फ बागडोर ही नहीं सौंपी बल्कि उन्हें इतने प्रचंड बहुमत से जिताया, जितना कोई सोच भी नहीं सकता था। खुद ममता को भी इस तरह की प्रचंड जीत की उम्मीद कतई नहीं थी। खैर माकपा शासन का अवसान करने की दीदी की मनोकामना पूरी हुई। मगर क्या जनता को दिखाये गये दीदी के सब्जबाग भी पूरे हुए। राज्य की जनता के मनोभावों को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। जिस उद्देश्य के साथ जनता ने दीदी को राज्य की सत्ता सौंपी थी। वह उम्मीद परवान नहीं चढ़ सकी। खुद राज्य में ममता सरकार में सहयोगी कांग्रेस के प्रदेश महासचिव ओमप्रकाश मिश्रा कहते हैं कि सरकार अपने उद्देश्यों से भटक गई है। जनता की भलाई के लिए किये जाने वाले विकास कार्यों से ध्यान हटाकर सरकार गैर जरूरी कामों में उलझ गई है। यह भटकाव सरकार के लिए ठीक नहीं है। मिश्रा के अनुसार राज्य सरकार में शामिल मंत्रियों के आत्मविश्वास में भी कमी नजर आ रही है। हालांकि कांग्रेस सरकार के कामकाज से खुश नहीं है फिर भी वह ममता सरकार को अपना समर्थन जारी रखेगी। प्रदेश महासचिव मिश्रा तल्ख टिप्पड़ी करते हैं कि जनता से वादे तो थोकभाव में किये गये किन्तु पूरे एक भी नहीं हुए।

ममता के कुछ अनछुए पहलू
बागी तेवरों को देखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मीडिया ने अग्निकन्या का संबोधन दिया था। यह अग्निकन्या देखते देखते हिटलर दीदी में भले ही तब्दील हो गयीं किन्तु वह भी एक आम भारतीय महिला जैसी ही हैं। धर्मभीरू, आस्थावान व पूजा पाठ में विश्वास रखने वाली। वे पिछले कई वर्षों से लगातार संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। उस दिन पूरे दिन वह उपवास रखती हैं। जब उनकी मां गायत्री देवी जीवित थीं, उस वक्त वह कहीं भी जाने से पहले मां की आज्ञा लेना नहीं भूलती थीं। ममता के भाई गणेश बनर्जी बताते हैं कि दीदी मां काली की परम भक्त हैं। सुबह स्नान करने के बाद कुछ देर वह जरूर ईश्वर का ध्यान करती हैं।

विवाद व ममता एक दूसरे के पूरक
विवादों व ममता का चोली दामन का साथ है। उनके विरोधी कहते हैं कि बगैर कोई विवाद किये उनका खाना हजम ही नहीं होता। सत्ता में होते हुए भी कई बार तो उनका व्यवहार विरोधी दल के नेता की तरह का होता है। विरोधाभास की प्रतिमूर्ति हैं ममता। मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद अस्पतालों के औचक दौरे के क्रम में एक नवजात शिशु को उसकी मां की गोद से लेकर उस पर अपनी ममता बरसाई। पर कोलकाता समेत मालदा व राज्य के अन्य इलाकों में बच्चों की लगातार होने वाली मौतों पर जब मीडिया ने उनकी आलोचना शुरू कर दी तो फिर उन्होंने इसका दोष पूर्ववर्ती वाममोर्चा सरकार पर यह कहते हुए डाल दिया कि उनकी वजह से ही कुपोषण के चलते बच्चों की मौत हो रही है। इसी तरह स्वयं एक महिला होने के बावजूद राजनीतिक बदले के तहत होने वाले महिलाओं से बलात्कार से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि यह सारा कुछ (साजानो) मनगढ़ंत है। फिर तो उनका यह जुमला मीडिया की सुर्खियां बन गया। हर घटना को उन्होंने मनगढ़ंत कहना शुरू कर दिया। इसी बीच रेल किराये में हुई मामूली बढ़ोत्तरी को आधार बनाकर अपनी ही पार्टी के रेलमंत्री को चलता करने के लिए जिद की हद तक उतर आईं। इसे लेकर उन्हें मीडिया ने नया नाम दिया हिटलर दीदी।

                                                                                                  बद्रीनाथ वर्मा मोबाइल - 9718389836