Wednesday, August 14, 2013

कुर्सी तेरे भाग में दो कौड़ी के लोग

                              Badrinath Verma 9718389836

हमारी आजादी को 67 साल हो गये। यह वक्त कम नहीं होता। एक पूरी की पूरी पीढ़ी बुढ़ा गई। लेकिन सवाल है कि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों ने जिस उद्देश्य के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी क्या हम उसे पूरा कर सके। क्या उन्होंने अपने प्राण न्योछावर इसलिए किये थे ताकि हम देश में भ्रष्टाचार, कदाचार की गंगा बहा दें। आज हमारा देश और किसी मामले में आगे हो न हो पर भ्रष्टाचार में दुनिया के दस शीर्ष देशों में है। पड़ोसी मुल्क चीन में मात्र कुछ लाख रुपये रिश्वत लेने के जुर्म में वहां के रेलमंत्री को फांसी की सजा सुना दी जाती है जबकि अपने यहां करोड़ों अरबों डकार जाने वाले हमारे राजनेताओं का एक बाल तक बांका नहीं होता। देश का कोई ऐसा महकमा नहीं बचा जहां भ्रष्टाचार ने अपने पांव नहीं पसारा हो। नीचे से ऊपर तक सभी एक दूसरे से होड़ लेते हुए भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रहे हैं। ताकि उनकी सात पीढ़ियां सुरक्षित हो जायें। इधर महंगाई है कि सुरसा के मुंह की तरह दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। लोगों का जीना दूभर हो रहा है। दिन ब दिन जिंदगी मुश्किल होती जा रही है। भ्रष्टाचार की ही देन है कि हर रोज अपना रुपया डॉलर से मात खाता जा रहा है। जिस गति से भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी हुई है उसी तेजी से रुपये का अवमूल्यन भी हुआ है। आज एक डॉलर की कीमत लगभग बासठ रुपये तक पहुंच चुकी है। जबकि 15 अगस्त 1947 को जब अंग्रेजों से देश को आजादी मिली उस समय रुपया व डॉलर कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। यानी एक रुपया एक डॉलर के बराबर था। लेकिन आजादी के 67 सालों में रुपया भी लगभग रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच गया है। या यूं कहें कि उससे भी आगे। आज एक डालर की तुलना में रुपये की औकात घटकर बासठ रुपये के आसपास पहुंच गयी है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। हालांकि इसके लिए सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल को दोष देना नाइंसाफी होगी। जब जिस पार्टी को मौका मिला उसने देश को कंगाल बनाने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी। हां, ये दीगर बात है कि आजादी के बाद सबसे ज्यादा सत्ता पर कांग्रेस ही काबिज रही। इस लिहाज से इसका सेहरा इसके सिर ही बंधता है।
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो हर देशवासी की आंखों में एक सुनहरे भविष्य का सपना था। पर वह सपना धीरे धीरे दिवास्वप्न में तब्दील होता गया। दिन बीतते गये लोकतंत्र राजतंत्र में तब्दील होता गया। वंशवाद से होते हुए सत्ता पर धन बल और बाद में बाहुबल हावी होता गया। 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का पालन महज एक रस्म अदायगी भर रह गया। बस एक वार्षिक समारोह। हर साल इस दिन लालकिले की प्राचीर से हमारे प्रधानमंत्री जी देश को सपने परोसते आ रहे हैं। पर वास्तव में ये सपने सपने ही रह गये आज तक धरातल पर नहीं आ सके। प्रत्येक भारतीय के लिए उसकी आजादी के भिन-भिन्न मायने रहे हैं। कोई स्वतंत्रता को किसी नजरिए से देखता है तो किसी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ कुछ अलग होता है। लेकिन एक बात जो हम सभी स्वीकार करते हैं वो यह है कि आजादी के बाद और आजादी के पहले वाले भारत में बहुत सी असमानताएं विद्यमान हैं। हालांकि बहुत से लोग इस बात पर एकमत हैं कि बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई, आपराधिक घटनाओं की वजह से, आज का भारत वो नहीं है जिसकी कल्पना आजादी के उन मतवालों ने की थी लेकिन सच यह भी है कि हम जिस आजाद भारत में जी रहे हैं उसे दुनिया के सबसे बड़े और महान लोकतांत्रिक देश होने का भी गौरव प्राप्त है। सवाल यह है कि यह आजादी मिली किसे। आम आदमी को आजादी का कितना फायदा मिला। देश के नये प्रभुवर्ग ने इसे हाइजैक कर लिया। अंग्रेजी जानने वाली देश की मात्र तीन प्रतिशत आबादी के हाथों में देश की सत्तानबे प्रतिशत जनता के भाग्य निर्धारण की बागडोर है।
आज देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी व महंगाई चरम पर है। ऐसे में जाहिर है देश में गरीबों की संख्या बढ़ी है, पर हमारे हुक्मरान आंकड़ेवाजी के सहारे गरीबी घटने का ढिढोरा पीटे जा रहे हैं। सवाल है कि हमें अंग्रेजों से तो आजादी मिल गई पर स्वराज्य हमसे अभी भी कोसों दूर है। अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का आजादी से तात्पर्य सिर्फ सत्ता हस्तानांतरण से था। बिल्कुल नहीं। लेकिन हुआ यही। आज भी देश में अंग्रेजों द्वारा बनाये गये अधिकतर कानून लागू हैं। वही मैकाले की शिक्षा पद्धति, वही पुलिसिया आतंक। कुछ भी तो नहीं बदला। हां, अगर कुछ बदला तो यही कि देश में नया प्रभुवर्ग तैयार हुआ।
सत्ता कायम रखने के लिए वोटों की सौदागरी हुई। धर्मनिरपेक्षता के आडंबर के तहत वोटबैंक की राजनीति हुई। यहां तक कि देश की कीमत पर भी। बस बदला तो यही कि गोरे अंग्रेजों की जगह हमारे देशी अंग्रेजों ने ले ली। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि यहां आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिन्दी व देश की अन्य भाषाएं अपना उचित स्थान नहीं पा सकीं। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट से पीड़ितों को न्याय हिन्दी में मिले इसके लिए किसी श्यामरूद्र पाठक को महीनों धरना देना पड़े इसके बाद पुलिस की गिरफ्तारी व जेल से दो चार होना पड़े तो इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है। विडंबना ही है कि हिन्दी का मर्सिया पढ़ने के लिए हम हर साल बड़े तामझाम के साथ हिन्दी दिवस मनाते हैं जबकि होना तो यह चाहिए था कि अंग्रेजों के साथ ही अग्रेजी की भी विदाई हो गई होती ताकि हम हिन्दी दिवस की बजाय अंग्रेजी दिवस मनाते जैसे स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर ऐसा हो जाता तो फिर इन तीन फीसदी अंग्रेजीदां का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता। सवाल यह भी है कि क्या आजादी देश को लूटने के लिए मिली थी। देश के विकास के नाम पर आजतक जितनी राशि का बंदरबांट हुआ अगर वास्तव में उन पैसों का सही तरीके से इस्तेमाल किया गया होता तो आज हमारा देश सचमुच ही सोने की चिड़िया होता। कहने का मतलब यह कि सत्ता केवल भाई भतीजावाद की भेंट चढ़ गई। लोकतंत्र के पहरुए कभी भाषा के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर कभी क्षेत्र के नाम पर तो कभी किसी और नाम पर सिर्फ लोगों की भावनाएं भड़काते रहे हैं। एक तो इससे लोगों का असली मुद्दों से ध्यान भटक जाता है और दूसरी यह कि इन भावनात्मक मुद्दों के सहारे वोटों की फसल भी जमकर काटी जाती है। नेताओं के बेतुके बयानों के तो क्या कहने। एक के बाद एक दिये जाने वाले उनके हास्यास्पद बयान तो खुद का ही सिर पीटने को बाध्य करते हैं। अभी हाल ही में कांग्रेस के युवराज व कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिनके हाथों में देश की बागडोर सौंपने को कांग्रेसी उतावले हैं, ने एक ऐसा बयान दिया जिसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार गरीबी का रिश्ता खाना, पैसा या भौतिक चीजों से नहीं है। उनके अनुसार गरीबी मानसिक बीमारी है। इसी तरह इसके पूर्व योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा का निर्धारण करने का जो कीर्तिमान बनाया गया। वह किसी के गले नहीं उतरा। बावजूद इसके कांग्रेस की ओर से इसके बचाव में जो जो बाते कही गईं, वे इनकी उथली सोच को ही परिभाषित करने वाली थी। योजना आयोग के निर्णय का बचाव करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रशीद मसूद ने कहा कि दिल्ली में पांच रुपये में भरपेट खाना मिल सकता है। अभी लोग उनके इस झूठ से उबरे भी नहीं थे कि अभिनेता से नेता बने बाया सपा कांग्रेस के प्रवक्ता राज बब्बर ने भी कह दिया कि मुंबई में भी बारह रुपये में दाल, चावल सब्जी सांभर के साथ भरपेट खाया जा सकता है। हद तो तब हो गई जब इन दोनों से दो कदम आगे बढ़ते हुए केंद्रीय मंत्री फारूख अब्दुल्ला ने सिर्फ एक रुपये में पेट भर जाने का दावा कर दिया। उनके इस दावे से लगा कि रशीद मसूद और राजबब्बर जनता को लूटने की फिराक में थे। उन्होंने महज एक रूपये में इच्छा भर खाने की बात कहकर मानों जनता को इनकी ठगी का शिकार होने से बचा लिया। हालांकि एक रुपये तो दूर पांच रूपये या बारह रुपये मे दिल्ली, मुंबई या देश के किस कोने में यह भोजन प्राप्य है इसे किसी ने भी नहीं बताया। शीतताप नियंत्रित ऊंची अट्टालिकाओं में रहने वाले लोगों का गरीबों के प्रति कितनी ओछी सोच है इसे साबित करने के लिए इनके ये उद्धरण काफी हैं। गरीबों व उनकी गरीबी का मखौल उड़ाते नेताओं के ये बयान हमारी आजादी को कलंकित करते हैं। इसी तरह हर दिन एक नये घोटाले के उजागर होने ने तो हमारी आजादी पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। जहां तक नेताओं की बयानबाजी का प्रश्न है तो यह हमारे नेतृत्व की सोच व जीवन के प्रति गंभीरता के अभाव का ही परिचायक है। यह हमें बताता है कि जिनके जिम्मे देश चलाने का दायित्व है, उनकी कितनी उथली सोच है। इन बयानवीरों को सामाजिक ताने-बाने की कितनी समझ है। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं है कि उनके ऐसे बयानों के क्या मायने हैं। इनका क्या संदेश जनमानस में जायेगा। निष्कर्ष यह भी है कि राजनेताओं की सोच देखकर राजनीतिक पराभव का आकलन कर लिया जाये। शायर अशोक अंजुम के शब्दों में अगर कहें तो दृश्य कुछ इस तरह का दिखता है-
न जाने किस जन्म का, भोग रही है भोग,

कुर्सी तेरे भाग में, दो कौड़ी के लोग।।

लातों का भूत है पाकिस्तान

                          Badrinath Verma

एक देसी कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। पड़ोसी देश पाकिस्तान भी ऐसा ही भूत है। उसे बातों से नहीं समझाया जा सकता। यह पूरी तरह से साबित हो गया है। वह हमारी भलमनसाहत को हमारी कमजोरी समझकर बार बार हमें उकसाने वाली कार्रवाई करता रहा है। जम्मू-कश्मीर के पुंछ क्षेत्र में हमला कर पाकिस्तानी सेना द्वारा पांच भारतीय सैनिकों की हत्या से पड़ोसी देश के नापाक मनसूबे एक बार फिर उजागर हो गये हैं। हालांकि यह सवाल पूछा जा सकता है कि पाकिस्तान के मनसूबे नापाक कब नहीं थे। पाकिस्तान की बागडोर नवाज शरीफ के हाथों में आ जाने के बाद लगा कि नये सिरे से भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते की गरमाहट आयेगी। पर ऐसी सद्इच्छा रखने वालों को शायद यह पता नहीं था कि नवाज सिर्फ नाम के शरीफ हैं। और हमारे प्रधानमंत्री नाम के सिंह। न तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री में कोई शराफत है और न ही हमारे प्रधानमंत्री में नाम के अनुरूप गुण। यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं नवाज शरीफ के शासनकाल में करगिल हुआ था। हां, यह अलग बात है कि इसका ठीकरा उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ के सिर पर फोड़ा था। पाक सेना जब तब हमें मुंह चिढ़ाती हुई हमारी सीमा में घुस आती है और कभी हमारे जवानों का सिर काटकर ले जाती है तो कभी भारी गोलीबारी कर हमारे जवानों का खून करती है। बावजूद इसके केंद्र सरकार पाकिस्तान को कोई कड़ा जवाब देने से बचती प्रतीत होती है। आखिर क्यों? देश यह जानना चाहता है कि वह कौन सी मजबूरी है जो पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने से हमें रोकती है। कभी चीन हमारे भू भाग पर कब्जा कर हमारे सैनिकों को वहां से खदेड़ देता है तो कभी भारत के सामने मच्छर की सी हैसियत रखने वाला पाकिस्तान युद्धविराम का उल्लंघन करते हुए हमारे पांच जवानों को शहीद कर देता है, और हम हैं कि सिर्फ मूकदर्शक बने देखते रहते हैं। पाकिस्तानी सेना द्वारा हमारे पांच जवानों की हत्या से देश की जनता का खून खौल रहा है। देश का मिजाज इस पार या उस पार का बन रहा है। देश चाहता है कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाय कि वह फिर ऐसी हिमाकत करने से पहले सौ बार सोचे। देश का मिजाज समझते हुए ही बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा यह पूछते हैं कि कांग्रेस का हाथ किसके साथ? भारत के या फिर पाकिस्तान के? उन्होंने ये बातें लोकसभा में पुंछ में पाकिस्तानी हमले में 5 जवानों के शहीद होने के मसले पर चर्चा के दौरान कहीं। गौर करने वाली बात है कि जब यशवंत सिन्हा बोल रहे थे तो उस वक्त सदन में जमकर हंगामा हो रहा था। हंगामे से नाराज यशवंत सिन्हा ने यह सवाल उठाया कि कांग्रेस अपनी स्थिति स्पष्ट करे। वह किसके साथ है। भारत के या फिर पाकिस्तान के?' बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने अपने बयान में कहा, 'पाकिस्तान ने हमारी धरती में घुसकर सेना के पांच जवानों को मौत के घाट उतार दिया। जनवरी में भी एक जवान का सिर काटकर ले गए थे। पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना होगा। हमारी सेना में बहुत ताकत है पर उसे असहाय कर दिया गया है।' सिन्हा सही कह रहे हैं। सेना को अगर छूट दे दी जाय तो विश्व मानचित्र से पाकिस्तान का नक्सा गायब होने में आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगेंगे। इस बीच केंद्रीय मंत्री और जम्‍मू कश्‍मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री फारुख अब्‍दुल्‍ला ने पाकिस्‍तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चेतावनी देते हुए कहा कि वे इस तरह की हरकतों पर रोक लगाएं, नहीं तो एक वक्‍त आ जाएगा जब हिन्‍दुस्‍तानी फौज भी अपने को कंट्रोल नहीं कर पाएगी। वहीं, बीजेपी प्रवक्‍ता रविशंकर प्रसाद का सवाल है कि और कितने जवान मरेंगे, और कितनों का बलिदान होगा? इस संदर्भ में मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा में कहा कि 'ऐसा लगता है कि पाकिस्तान अब हमसे नहीं डरता है। इसलिए ऐसी हरकतें कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ चीन भारत पर हमला करने की तैयारी कर रहा है। उसने तो नया नक्शा भी तैयार कर लिया है। पाक से हमारी सीमा को खतरा है। इसके अलावा चीन से भी सचेत रहने की जरूत है। चीन धोखेबाज देश है। इस बार दोनों देश एक साथ धोखा दे रहे हैं। सोनियाजी और रक्षा मंत्री साहब चीन पर भरोसा मत करिएगा।
पाकिस्तानी नियंत्रण रेखा से सटे पुंछ के चाकन-दा-बाग के सरला चौकी पर तैनात इन जवानों पर पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सीमा में करीब 450 मीटर तक घुस कर गोलीबारी की, जिसमें कुल पांच जवान शहीद हो गए थे। इन शहीद जवानों में चार बिहार के और एक महाराष्ट्र का था। 21वीं बिहार रेजिमेंट के शहीद हुए जवानों में पटना जिले के बिहटा थाना क्षेत्र निवासी विजय राय, भोजपुर जिला निवासी शंभू शरण सिंह, और सारण जिला के सम्हौता गांव निवासी प्रेमनाथ सिंह और सारण के ही एकमा गांव के रघुनंदन प्रसाद शामिल थे। जबकि महाराष्ट्र के कोल्हापुर निवासी शहीद जवान का नाम कुंडलीक माने है। हैरानी की बात यह रही कि शहीदों के सम्मान में कसमें खाने वाला एक भी मंत्री जवानों को श्रद्धांजलि देने एयरपोर्ट नहीं पहुंचा। 7 अगस्त की रात दिल्ली एयरपोर्ट पर पूरे सम्मान के साथ शहीदों के शव उतारे गए, पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मौके पर न तो रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी मौजूद थे और न ही केंद्र सरकार का कोई और मंत्री। यह हाल तब है, जब संसद का मॉनसून सत्र चल रहा है और केंद्र सरकार का लगभग हर मंत्री दिल्ली में मौजूद है। बावजूद इसके एक भी मंत्री को इतनी फुरसत नहीं मिली कि शहीदों के सम्मान में एयरपोर्ट तक पहुंचता। इस मामले में बिहार तो और दो कदम आगे ही निकला। राज्य के मंत्रियों की बेरुखी का आलम यह था कि शहीद हुए बिहार के चार जवानों का पार्थिव शरीर जब पटना पहुंचा तो न तो राज्य सरकार का एक भी मंत्री जवानों को श्रद्धांजलि देने एयरपोर्ट पहुंचा और न ही उनकी अंत्येष्टि में ही कोई मंत्री शामिल हुआ। इन जवानों पर घात लगाकर किये गये पाकिस्तानी हमले से जहां देश उबल रहा है, लोग जगह जगह धरना प्रदर्शन के माध्यम से पाकिस्तान के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं, वहीं इसे लेकर सियासत की बेशर्म तकरीर भी सुनने को मिली। दरअसल, शहीद जवानों की अंतिम क्रिया में किसी मंत्री के नहीं पहुंचने को लेकर बिहार के ग्रामीण कार्य मंत्री भीम सिंह से जब यह पूछा गया कि वे शहीदों के अंतिम संस्कार में क्यों शामिल नहीं हो सके। उनका जवाब था कि सेना और पुलिस में लोग मरने ही जाते हैं। मंत्री महोदय यहीं नहीं रुके बल्कि उल्टे रिपोर्टर से ही सवाल कर डाला, 'आप क्यों नहीं गए नागरिक के तौर पर, आप ड्यूटी पर थे न आपके बाबूजी गए थे वहां? आपके पिता नागरिक हैं न? आपके पिता गए वहां?
जैसे ही भीम सिंह का यह बयान सामने आया बिहार में सियासी हंगामा मच गया। आरजेडी के विधायक भाई वीरेंद्र ने तो उनसे इस्तीफे की मांग कर ली। बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए। अपने मंत्री के कारनामे के बाद बढ़ते राजनीतिक दबाव से त्रस्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक्शन में आए। उन्होंने भीम सिंह के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और माफी मांगने को कहा। नीतीश कुमार की नाराजगी के बाद भीम सिंह ने मीडिया के सामने माफी मांग ली। मीडिया के तमाम सवालों पर वह एक ही वाक्य कहते नजर आए, 'मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। लेकिन मैं इस पूरे प्रकरण पर खेद प्रकट करता हूं।' भीम सिंह ने भले ही माफी मांग ली पर यह तो साबित हो ही गया कि सरहद की रक्षा करते हुए हमारे शहीदों के लिए हमारे सियासतदानों के मन में कैसी ओछी सोच है।


अब नहीं चलेगी मुंह में राम बगल में छुरी
 पुंछ में पाकिस्तान के कायरतापूर्ण हमले का सीधा असर अब भारत-पाक बातचीत पर पड़ता नजर आ रहा है। फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे यही लगता है कि मौजूदा हालात में भारत पड़ोसी मुल्क से किसी भी स्तर की बातचीत के लिए तैयार नहीं है। दोनों देशों के बीच सचिव स्तर की बातचीत रोक दी गई है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भी क्या मनमोहन सिंह पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ से मुलाकात करेंगे। सूत्रों की मानें तो चौतरफा दबाव के बीच मनमोहन इस मुलाकात को भी टाल सकते हैं।
इस बीच, इस्लामाबाद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सीमा पर बढ़े तनाव पर अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में सेना के शीर्ष अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज भी शामिल हुए। बैठक के बाद दिए बयान में शरीफ ने पुंछ हमले का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने बस इतना कहा कि एलओसी पर युद्धविराम बहाल करने के लिए वह भारत के साथ मिलकर कदम उठाएंगे।उन्होंने कहा कि दोनों देशों के हित में है कि हालात न बिगड़ने दिए जाएं।
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गोपीनाथ मुंडे बीजेपी के एंटनी
पुंछ हमले पर जिस बयान को लेकर बीजेपी अब तक रक्षा मंत्री ए के एंटनी को घेरती आई, अब खुद भी उसी सियासी बयानबाजी के दलदल में फंसती नजर आ रही है। इसकी वजह है पार्टी के नेता गोपीनाथ मुंडे का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के जवान कुंडलीक माने पाकिस्तान बॉर्डर पर आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। जैसे ही मुंडे ने ये बयान दिया एनसीपी ने बीजेपी पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए उनपर धावा बोल दिया। अब एनसीपी उनसे माफी की मांग कर रही है।
एनसीपी का कहना है कि बीजेपी ने ऐसे ही बयान पर एंटनी की माफी को लेकर दो दिन तक संसद नहीं चलने दी। शहीद माने की मौत पाकिस्तान बॉर्डर नहीं बल्कि एलओसी पर हुई थी। दरअसल, गोपीनाथ मुंडे कोल्हापुर में शहीद कुंडलीक माने के अंतिम-संस्कार में शामिल होने गए थे। उन्होंने ये बातें इस दौरान ही कहीं।
शहीदों पर सियासत का सिलसिला यहीं नहीं थमा। एनसीपी ने शहीद जवान के अंतिम-संस्कार में नहीं आने के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण पर भी निशाना साधा है। उसका कहना है कि राजकीय सम्मान के कुछ प्रोटोकॉल होते हैं। प्रोटोकॉल का पालन तो हुआ पर राज्य के मुख्यमंत्री को नैतिक तौर पर आना चाहिए था।
गौरतलब है कि शहादत पर बयानबाजी की शुरुआत 6 जुलाई को रक्षा मंत्री के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि हमलावर पाक सेना की वर्दी में आए थे। बीजेपी ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा था कि ऐसा कहना पाकिस्तानी सेना को क्लीनचिट देना है। हालांकि, चौतरफा दबाव के बीच रक्षा मंत्री ने गुरुवार को संसद में माना कि चक्कां दा बाग चौकी पर हुआ हमला, जिसमें पांच भारतीय जवान शहीद हो गए, पाकिस्तानी सेना की ओर से ही किया गया था।

रुपया नहीं, पाकिस्तान को जवाब दो

जम्मू एवं कश्मीर के पुंछ में पाकिस्तान की तरफ से हुई फायरिंग में शहीद हुए जवानों के गांव वाले पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इस बीच शहीद विजय कुमार राय की पत्नी पुष्पा राय ने सरकार द्वारा घोषित सहायता राशि लेने से इनकार कर दिया है। बिहार की राजधानी पटना के बिहटा के आनंदपुर ठेकहा गांव निवासी शहीद विजय कुमार राय की पत्नी पुष्पा पूछती हैं कि क्या किसी व्यक्ति की कीमत 10 लाख रुपये है। सहायता राशि लेने से इनकार करते हुए शहीद की पत्नी की मांग है कि पहले पाकिस्तान पर कार्रवाई हो फिर सहायता राशि की बात होगी। विजय राय के चाचा रामजी सिंह कहते हैं कि आखिर पाकिस्तान बार बार भारतीय सैनिकों की जान लेता है, परंतु सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती है।