Monday, August 13, 2012

खेल अभी खत्म नहीं हुआ है



राजनीति में सब जायज है का सिद्धांत नीति को ले डूबा बस राज रह गया वो भी जरा सा !

इन्ट्रो- दिल की राजनीति करने वाली दीदी घाघ और मौकापरस्त राजनीतिज्ञ नेताजी के पैंतरे से तिलमिलाई हुई हैं। अभी चुप हैं। पर ममता के जिद्दी और बेलौस स्वभाव से परिचित जानते हैं कि उनकी यह चुप्पी कल नेताजी पर भारी पड़ सकती है

हाईलाईटर- राइटर्स बिल्डिंग से जबरदस्ती बाहर निकाले जाने पर ममता दुबारा उन्नीस साल बाद तब गईं जब वह मुख्यमंत्री बन गईं
- तीन दशक से राजनीति में हैं ममता दीदी पर उनके दामन एक भी बदनुमा दाग नहीं है


खेल अभी खत्म नहीं हुआ है ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

महामहिम महाकाव्य की तीसरी और सबसे अहम किरदार हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। दीदी के रूप में मशहूर ममता कभी सोच भी नहीं सकती थीं कि जिन नेताजी पर वह आंख मूंदकर भरोसा कर रही हैं वही उन्हें इस तरह गच्चा दे जाएंगे। दरअसल इसमें नेताजी की उतनी गल्ती नहीं है। ममता ही उन्हें समझने में भूल कर गईं। ममता के बारे में अक्सर ही यह कहा जाता है कि वह सोचने का काम भी दिल से ही करती हैं। इसलिए अक्सर गच्चा खा जाती हैं।
बहरहाल मुलायम सिंह यादव के रातोंरात पाला बदल लेने के बाद दीदी ने यह कह कर कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, अपनी मंशा का इजहार कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ममता बनर्जी सहज में ही हार मानने वालों में नहीं हैं। भले ही पहलवान रहे मुलायम सिंह यादव ने प्रणब के नाम का समर्थन कर ममता बनर्जी को धोबियापाट दे दिया हो पर ममता ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। उन्हें तत्काल समझ आ गया कि आखिर क्यों नेताजी पल्टी मार गए। बस फिर क्या था, उन्होंने भी मुलायम की मंशा पर पानी फेरते हुए कह दिया कि वह यूपीए से या सरकार से बाहर नहीं आ रही हैं। इस तरह मुलायम सिंह के मंत्री बनने के सपने को फिलहाल उन्होंने चकनाचूर कर दिया है।
ममता को निकट से जानने वालों का कहना है कि दीदी अपने दोस्त व दुश्मन को हमेशा याद रखती हैं। एक नंबर की जिद्दी ममता जब एक बार कोई काम मन में ठान लेती हैं तो फिर उसे पूरा किये बिना दम नहीं लेतीं। जाहिर है वह नेताजी को भी कभी न कभी मजा जरूर चखाएंगी। इस संबंध में एक घटना का उल्लेख करना यहां समीचीन होगा। लगभग 20 साल पहले ममता बनर्जी एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलने राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग गईं थीं। वहां से किसी कारणवश उन्हें जबरदस्ती बाहर निकाल दिया गया। उसी समय उन्होंने शपथ खाई थी कि वह राज्य सचिवालय में तभी कदम रखेंगी जब इसके योग्य बन जायेंगी। उन्होंने अपने इस सौगंध को हर पल याद रखा। उन्होंने राइटर्स बिल्डिंग के अंदर दुबारा तभी प्रवेश किया जब वह राज्य की मुख्यमंत्री चुनी जा चुकी थीं। इसके लिए उन्होंने सुदीर्घ 19 वर्षों तक इंतजार किया। उनकी इस तरह के कार्यकलापों की प्रशंसा किये बिना ममता के विरोधी भी नहीं रह पाते। ममता जिद्दी हैं, तुनकमिजाज हैं यह सच है लेकिन वह धोखेबाज नहीं हैं। जबकि मुलायम के बारे में कहा जाता है कि वह लोगों के साथ तभी तक रहते हैं जब तक उनका हित सधता रहता है। जैसे ही उन्हें लगता है कि इन तिलों में अब तेल नहीं है तुरंत पाला बदल लेते हैं। मौकापरस्ती के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं मुलायम सिंह यादव। जैसे ही कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम का ऐलान किया वैसे ही ममता का साथ छोड़कर नेताजी कांग्रेस के पाले में आ गए। इससे खुद को ठगा महसूस कर रही दीदी ने अपने स्वभाव के विपरीत संयम का परिचय देते हुए नेताजी के खिलाफ कुछ कहा तो नहीं किंतु उन्हें निकट से जानने वालों का दावा है कि इस धोखे का जवाब ममता उन्हें जरूर देंगी। उनकी हालत इन दिनों घायल शेरनी जैसी है।
ममता की अक्सर उनकी तुनकमिजाजी व केंद्र को सांसत में डालने जैसी हरकतों के लिए आलोचना होती रहती है। उन पर आरोप लगता है कि वह केंद्र को ब्लैकमेल करने की हद तक उस पर दबाव बढ़ाती हैं। दरअसल उनका यह तरीका भले ही दूसरों की नजर में गलत लगे पर इस सबका उद्देेश्य एक मात्र बंगाल की भलाई ही होता है। इस नजर से अगर देखा जाए तो उन्हें गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। रेलमंत्री रहने के दौरान भी उनका विशेष ध्यान बंगाल पर ही रहता था। इससे उन पर छींटाकशी भी की जाती थी। उन्हें केंद्रीय रेलमंत्री के बजाय बंगाल का रेलमंत्री कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।
ममता जिद्दी हैं, तुनकमिजाज हैं, अपनी बातें मनवाने के लिए ब्लैकमेल की हद तक चली जाती हैं आदि सारी बातें सच हैं पर एक सच्चाई यह भी है कि लगभग तीन दशक से अधिक राजनीतिक जीवन में रहने के बावजूद उनके दामन पर एक भी बदनुमा दाग नहीं हैं। व्यक्तिगत जीवन में काफी ईमानदार मानी जाने वाली ममता सादगी पसंद हैं। पैरों में हवाई चप्पल व नीली या काली बार्डर वाली सफेद साड़ी उनकी पहचान है। राज्य की मुख्यमंत्री होने के बावजूद वह आज भी कालीघाट स्थित अपने उसी टालीबाड़ी में रहती हैं जहां शुरू से ही वह रहती आई हंै। उनके व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी है कि वह भी एक आम भारतीय महिला जैसी धार्मिक कर्मकांड में पूरा विश्वास करती हैं। उन्हें मां काली व संतोषी माता में अगाध श्रद्धा है। आज भी वह प्रत्येक शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत जरूर रखती हैं। यही नहीं जब उनकी मां गायत्री देवी जीवित थीं उस समय घर से निकलते वक्त उनका आशीर्वाद लेना ममता कभी नहीं भूलती थीं।
बहरहाल मुलायम सिंह के यू टर्न लेने से ममता मन ही मन आग बबूला तो हैं पर उन्होंने इसे उजागर नहीं किया है। उन्होंने कहा कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, इंतजार कीजिए! ऐसे में यहां सवाल उठता है कि यह खेल क्या है। और किसका खेल खत्म नहीं हुआ। ममता का या मुलायम का। दरअसल ममता और मुलायम की जोड़ी को स्वाभाविक माना भी नहीं जा रहा था। क्योंकि जब भी ममता केंद्र सरकार की फजीहत करने पर उतारू होतीं तो उनका विकल्प मुलायम सिंह में तलाशा जाने लगता था। दिनेश त्रिवेदी प्रकरण में भी यही हुआ था। रेलमंत्री पद से दिनेश त्रिवेदी को हटाये जाने को लेकर जो हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। उस वक्त लगभग तय हो गया था कि ममता को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। बाकायदा मुलायम सिंह को रेलमंत्री बनने का प्रस्ताव भी दे दिया गया था। सूत्रों के अनुसार नेताजी ने इसे स्वीकार भी कर लिया था। पर अचानक ममता के दिल्ली आ जाने से वह योजना परवान नहीं चढ़ पाई और नेताजी को बैरंग रह जाना पड़ा था। नेताजी रेलमंत्री नहीं बन पाने की कसक मन में दबाए मौके की ताक में थे। जबकि ममता की सोच थी कि यूपीए जिन मुलायम सिंह को उनके विकल्प के रूप में देखती है उन्हें ही अपने साथ कर लिया जाए। लेकिन यहीं गच्चा खा गईं ममता। मुलायम ठहरे घाघ राजनेता। उन्होंने जैसे ही देखा कि ममता व यूपीए में दूरी बढ़ रही है। आनन-फानन में ममता का हाथ झटककर यूपीए की गोद में जा बैठे। हालांकि उन्होंने सफाई दी कि वह यूपीए या सरकार का समर्थन नहीं कर रहे हैं बल्कि प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर रहे हैं। बहरहाल उनसे सलाह मशविरे के बाद ही ममता ने राष्ट्रपति पद के लिए मनमोहन सिंह के साथ ही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम व सोमनाथ चटर्जी का नाम आगे बढ़ाया था। सूत्रों का तो दावा है कि यह सोनिया की सहमति से ही हुआ था। इरादा था, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मन की टोह लेने की। पर जैसे ही पीएमओ की ओर से इस प्रस्ताव को खारिज किया गया। कांग्रेस ने अपना स्टैंड बदलते हुए सारा दारोमदार ममता पर डाल दिया। ऐसी परिस्थिति में ममता को उम्मीद थी कि नेताजी उनका साथ अवश्य देंगे। पर एक जमाने में पहलवान रहे मुलायम सिंह ने उन्हें धोबियापछाड़ दे डाला। जैसे ही कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम की घोषणा की मुलायम सिंह उनके पक्ष में जा खड़े हुए।

ममता की छवि एक फायर ब्रांड राजनेत्री, पारदर्शी नेता की है। पर उनमें सब कुछ अच्छा होने के बाबजूद अतिशय आक्रामकता है, जो हमेशा अच्छी नहीं होती। ममता ने जिस राजनितिक अपरिपक्वता का परिचय दिया यह उनके प्रशंसकों को निश्चित ही नागवार गुजरा होगा। वे एक जुझारू महिला हैं। लेकिन 13 जून को  उन्होंने जो राजनीतिक गलती की वह उन्हें जीवन भर सालती रहेगी। मुलायम सिंह जैसे परिपक्व नेता और अपने नफा-नुकसान की समझ रखने वाले कद्दावर नेता के साथ उन्होंने यूपीए पर दबाब बनाने की जो राह चुनी वह एक मंजे हुए नेता की नहीं कही जा सकती। राजनीति का पहला उसूल है कि तेल देखो और तेल की धार देखो। ममता ने न तो तेल ही देखा और न ही तेल की धार देखी। मुलायम ने तो यूपीए में ममता की दीदीगिरी की धार कुंद करने के लिए और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ही ममता का दो कदम साथ दिया और चार कदम पीछे हट गए। यह मुलायम की राजनीतिक चतुराई का परिणाम ही है कि वे अपनी बहू डिंपल को कन्नौज से निर्विरोध सांसद बना ले गए। निश्चित ही मुलायम ने ममता की आक्रामकता को हवा देकर यूपीए में अपनी वजनदारी बढ़ाने और अपरिहार्यता बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर ली। वस्तुत: ममता बारगेनिंग करने वाली महिला नेता नहीं हैं। उनमें जोश इतना अधिक है कि वे अपने होश को दांव पर लगा देती हैं। काश कि वे सोनिया जी से मिलने के बाद और मुलायम से दोबारा मिलने के बाद इतनी आक्रामक नहीं होतीं। ममता की साफगोई और राजनीतिक तेवरों की जनता प्रशंसक है। यह इसी बात से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कई दशकों के माक्र्सवादी शासन को बंगाल से उखाड़ फेंका। उनकी इसी आक्रामक शैली और दो टूक राजनीति को जनता ने पसंद किया। लेकिन चुनाव जीतने और मगरमच्छ राजनेताओं के बीच, जिनमें कुटिल राजनीतिक समझ है, निर्वाह करने में अंतर है जो ममता को अब समझ आ रहा होगा।
ममता भावनात्मक राजनीती करती हैं जबकि निश्चित ही इसमें भावनाओं का कोई महत्व नहीं होता। लेकिन ममता की भावनात्मक राजनीति राजनीतिज्ञों को भले ही रास नहीं आती हो किंतु जनता में यही उनकी ताकत है। वर्तमान भूल को छोड़ दें तो वे न केवल बंगाल में बल्कि समूचे देश में लोकप्रिय हैं। जिसका महत्वपूर्ण उदाहरण यही है कि यूपी के मथुरा कि मांट सीट पर वहां की जनता ने टीएमसी को जिताया। मुलायम की समाजवादी पार्टी ने जिस उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त कर सरकार बनाई हो वहां ममता के कैंडिडेट का जीतना क्या मुलायम के लिए खतरे कि घंटी नहीं माना जायेगा। ऐसे में ममता को धोखा देने में कोई कैसे परहेज करता। मांट में एसपी तीसरे नंबर पर रही। सच्चाई यह है कि ममता दिल की राजनीति करती हैं। पर इसबार वे चूक गईं। यदि वे दिमाग की राजनीति करतीं तो यह स्थिति नहीं बनती। अगर उन्होंने अपने मतों की संख्या बल पर गौर किया होता और मुलायम के झांसे में ना आई होतीं तो स्थिति कुछ और होती। इतने कम संख्या बल पर किंगमेकर की गलत फहमी पाल लेना भूल से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी यदि वे अपने पत्ते नहीं खोलतीं और मौन रहकर तमाशा देखतीं तो आज स्थिति कुछ और होती। यूपीए ममता की नाराजी और खुशी को इससे पहले तक गंभीरता से लिया करता था। किंतु आज उसके पास सिवाय हंसने के कुछ नहीं है। ममता ने बंगाल की जनता को भी कमोबेश नाराज ही किया है। बंगाल की जनता हो या किसी अन्य राज्य की, सभी अपने राज्य के व्यक्ति को उच्च पदों पर बैठा देखना चाहते हैं क्योंकि वह इससे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। दीदी की सोच भले ही व्यापक रही हो किंतु प्रणब दा का विरोध बंगाल की जनता को रास नहीं आया। बहरहाल ममता जाने-अनजाने गलती कर बैठी हैं किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कल थीं। ममता कल भी इतनी ही प्रासंगिक रहेंगी क्योंकि वे ईमानदारी से अपना काम करती हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव हो सकता है उनकी भूमिका को आज से अधिक महत्वपूर्ण बना दे।

हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी पर कायम हैं। संप्रग की ओर से मुखर्जी को अपना उम्मीदवार घोषित किए जाने के फैसले से अविचलित ममता ने कोलकाता में कहा कि हम कलाम की उम्मीदवारी पर कायम हैं। वह सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। हम उस रुख से नहीं पलट रहे हैं, जिसकी घोषणा हमने पहले की थी। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के पीछे हटने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मुलायम ने मुझे धोखा नहीं दिया है।
वहीं, संप्रग के उम्मीदवार का विरोध करने की तृणमूल कांग्रेस की रणनीति ने उसके कांग्रेसनित गठबंधन में बने रहने पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस का संप्रग में बने रहना उनके इस अडिय़ल रुख के चलते अधर में लटक गया है कि एपीजे अब्दुल कलाम ही राष्ट्रपति पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार होंगे जबकि संप्रग ने प्रणब मुखर्जी को अपना उम्मीदवार चुना है।
 बद्रीनाथ वर्मा 9718389836

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