Sunday, October 18, 2015

सजनी हमहूं राजकुमार

(राष्ट्रीय मासिक पत्रिका कैमूर टाइम्स में प्रकाशित)
बद्रीनाथ वर्मा
मगध एक्सप्रेस मुगलसराय से खुलकर दिलदारनगर को पीछे छोड़ते हुए जैसे ही कर्मनाशा नदी पार कर बिहार की सीमा में प्रवेश करती है, सियासत की शातिर हवा फिजा में महसूस होने लगती है। बक्सर आते-आते यह हवा अपने पूरे रौ में प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन की बोगियों तक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगती है। बिहार चुनावी मोड में आ चुका है, इसका आभास यहां भली-भांति होने लगता है। चुनावी चर्चा से ट्रेन की बोगियां भी अछूती नहीं रह जाती हैं। पटना पहुंचते-पहुंचते सियासी धुंध पूरी तरह से छंट जाती है। प्लेटफार्म से बाहर निकलते ही सब कुछ साफ साफ नजर आता है। यहां हर कोई ‘सजनी हमहूं राजकुमार’ की तर्ज पर बिहार को बदलने का दावा कर रहा है। यहां ख्वाबों की मंडी सच चुकी है। राजनीतिक दलों में सपना बेचने की होड़ लगी है। चुनावी मंडी में कौन कितना बड़ा सपना बेच सकता है, इसके लिए बाकायदा एक दूसरे को धकियाकर मतदाताओं को लुभाने की एक से एक तरकीबें आजमाई जा रही हैं। इसके लिए हर सड़क, चौराहा, यहां तक कि नुक्कड़ों व गलियों तक को नहीं बख्शा गया है। राजधानी पटना की सड़कों पर लगे नेताओं के बड़े-बड़े होर्डिंग्स बता रहे हैं कि बिहार बस उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है। ‘आगे बढ़ता रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार’ या ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’ के उद्घोष के साथ होर्डिंग्स के मामले में नीतीश कुमार तमाम विपक्षी दलों को मीलों पीछे छोड़ते प्रतीत हो रहे हैं। कोई ऐसी सड़क या गली नहीं बची है जहां नीतीश कुमार के बड़Þे बड़े होर्डिंग्स न लगे हों। होर्डिंग्स हालांकि भाजपा के भी कम नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटोयुक्त होर्डिंग महागठबंधन पर प्रहार कर रहे हैं। ‘अपराध, अहंकार भ्रष्टाचार, क्या इस गठबंधन से बढ़ेगा बिहार’। होर्डिंग्स की कमी को भाजपा परिवर्तन रथ से पूरी कर रही है। पटना समेत पूरे बिहार में घूम रहे परिवर्तन रथ एक तरफ केंद्र सरकार की उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं वहीं कल तक एक दूसरे को गरियाने वाले लालू यादव व नीतीश कुमार द्वारा एक दूसरे की शान में पढ़े गये कसीदों की रिकार्डिंग सुनाकर मतदाताओं को बताया जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन सिर्फ सत्ता हासिल करने भर के लिए बना है। वाकई बड़ी विचित्र स्थिति है। कल तक एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाने वाले आज एक दूसरे के सामने ताल ठोंक रहे हैं। ललकार रहे हैं। चाहे वह पप्पू यादव हों या जीतनराम मांझी। जिस जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनाया वह विरोधी के शामियाने की शोभा बढ़ा रहे हैं और जिनके शामियाने में खुद नीतीश कुमार पालथी मारे बैठे हैं कल तक उन्हें जंगलराज का मसीहा करार देते हुए गाली देते नहीं अघाते थे। लेकिन आज चुनावी मजबूरी ने दोनों को एक ही छत के नीचे ला खड़ा किया है। बिहार की सत्ता उनके हाथों से छीनने को आतुर भाजपा लगातार उनके इसी जुमले ‘जंगलराज’ को हथियार बनाकर वार पर वार किये जा रही है। भाजपा के वार से घायल नीतीश को इसका सटीक जवाब नहीं सूझ रहा। मुश्किल यह है कि सांप्रदायिकता जैसे शब्द बेअसर साबित हो चुके हैं। बिहार में विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाले नीतीश की परेशानी वाकई इस बात ने बढ़ा दी है कि चुनाव में उनके रथ का सारथी वह है जिस पर जंगलराज का तोहमत लगाकर कल तक वह उसकी परछाई तक से परहेज करते थे। इसी तरह लालू का खेल बिगाड़ने में लगे पप्पू यादव पर राजद व जदयू दोनों हमलावर हैं। पप्पू यादव के सियासी असर के सवाल पर जदयू प्रवक्ता नीरज उन्हें बिहार की राजनीति का शिखंडी करार देते हैं। जदयू प्रवक्ता ने कैमूर टाइम्स से कहा कि भाजपा पप्पू का इस्तेमाल वोट कटवा के रूप में कर रही है, लेकिन बिहार में ‘पप्पू कांट डांस’ साबित होगा। उधर, राजद प्रवक्ता भगवान सिंह कुशवाहा ने पप्पू को भाजपा के टॉप-अप पर रिचार्ज होकर चलने वाला नेता बताया। वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी लालू-नीतीश के गठजोड़ पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि बिहार में सरकार बनाने के लिए नहीं, दूसरा दल सरकार न बना ले, इसके लिए गठजोड़ हुआ है। यही नहीं अपने हर भाषण में नीतीश पर निशाना साधते हुए सुशील मोदी लगातार भाजपा से गठबंधन तोड़ने को लेकर प्रहार करते हुए सवाल उठाते हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री कहते हैं गठबंधन तोड़ने का अधिकार हर किसी को है लेकिन जनादेश तोड़ने का अधिकार किसी के भी पास नहीं। अगर उन्हें गठबंधन तोड़ना ही था तो फिर से चुनाव मैदान में आते। सिर्फ सत्ता के लिए गठबंधन जनता के साथ छलावा है। बहरहाल, बात होर्डिंग्स की हो रही थी। पटना शहर के बिजली के खंबों पर लोकजनशक्ति पार्टी का कब्जा है। चिराग पासवान के ऐलाने जंग जैसी मुद्रा वाली तस्वीरों के साथ छोटे-बड़े होर्डिंग्स व पोस्टर ‘इसी चिराग से होगा बिहार का हर घर रौशन’ छाये हुए हैं। कहीं कहीं लालू प्रसाद यादव के साले व लालू राज में जंगलराज के प्रतीक कहे गये साधु यादव की पार्टी गरीब जनता दल (सेक्युलर) भी बिहार को बदलने का दावा कर रही है। यदा कदा राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के पोस्टर भी नीतीश कुमार सरकार की असफलता गिनाती नमूदार है। इससे इतर बिहार को बदलने के लिए केवल एक साल की मांग कर रहे पप्पू यादव का दावा है कि यदि इस दौरान वे बिहार को नहीं बदल पाये तो राजनीति से संन्यास ले लेंगे। उनके भी बड़े बड़े होर्डिंग्स पटना के मुख्य-मुख्य जगहों पर अपना कब्जा जमाये हुए हैं। पप्पू के सवाल उठाते पोस्टर समाधान भी बताते हैं। मसलन, ‘जब महिलाओं पर हो रहा है अत्याचार तो कैसे बढ़ेगा बिहार, लेकिन बदलेगा बिहार, बढ़ेगा बिहार, मैं बदलूंगा बिहार।’ ऐसे में भला लालू प्रसाद यादव कैसे पीछे रह सकते हैं। लालू व राबड़ी देवी के फोटो से युक्त उनके पोस्टर भी राजधानी पटना में छाये हुए हैं। राजद के पोस्टरों में लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव को भी विशेष तवज्जो दी गई है। यह इस बात का भी ईशारा है कि लालू के वारिस तेजस्वी यादव ही होंगे। उनके पोस्टरों में ‘काम कुछ नहीं, प्रचार ज्यादा, क्या यही है तेरा अच्छे दिनों का वादा’ के जरिए सीधा पीएम नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया गया है। इसी तरह राजद के एक और पोस्टर की चर्चा जरूरी है। ‘ठगों की बातों में न आएं, चलो अपना बिहार बनाएं।’ बहरहाल, अभी चुनाव के तारीखों की घोषणा नहीं हुई है लेकिन हरेक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए अभी से अपना एड़ी चोटी का जोर लगा चुका है। लोकसभा चुनाव में महाबली मोदी के हाथों जबरदस्त शिकस्त खा चुके राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बार कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहते। गठबंधन के साझीदारों का मानना है कि भाजपा लगभग 30 फीसदी व सहयोगियों को मिलाकर एनडीए के खाते में महज तकरीबन 38 फीसदी ही मत गये थे। यानी कि 62 प्रतिशत मतदाताओं का रुख एनडीए के खिलाफ था। इसी 62 फीसदी को साधने के लिए लालू को जहर पीकर भी नीतीश का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा है। उधर, बिहार में लगभग 14 फीसद यादव मतदाताओं पर अपना एकाधिकार मानने वाले लालू प्रसाद यादव की हवा निकालने के लिए भाजपा अपने सभी यादव नेताओं को इसमें सेंध लगाने के लिए मैदान में उतार चुकी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा इस बार कम से कम 70 सीटों पर यादव उम्मीदवारों को खड़ा करेगी। खास बात यह है कि भाजपा उन्हीं सीटों पर यादव उम्मीदवार खड़ा करेगी, जहां से जदयू अपने उम्मीदवार उतारेगा। इस प्रकार भाजपा की यह रणनीति होगी कि जदयू को राजद के यादव मतदाताओं का वोट न मिले। बिहार में यादवों का असली नेता कौन है हालांकि इस पर विवाद है। लालू जहां खुद को यादवों का एकमात्र नेता मानते हैं वहीं विरोधी इसको सिरे से खारिज करते हैं। विरोधियों का दावा है कि अगर वाकई लालू की पैठ यादवों में होती तो उनकी पत्नी और बेटी लोकसभा चुनाव में यादव बहुल्य सीटों से क्योंकर हार गईं। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार व विश्व संवाद केंद्र के संपादक संजीव कुमार कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि लालू  प्रसाद यादवों के बड़े नेता हैं लेकिन एकमात्र नेता नहीं हैं। नब्बे के दशक से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। अब पप्पू यादव से लेकर हुक्मदेव नारायण यादव व रामकृपाल यादव तक तमाम नेताओं की यादव वोटों पर अपनी अपनी दावेदारी है। बहरहाल, अभी की स्थिति यह है कि पोस्टरों के मामले में नीतीश कुमार जहां सबसे आगे चल रहे हैं वहीं 340 परिवर्तन रथ के सहारे भाजपा पूरे बिहार में एक बार फिर मोदी की आंधी को सुनामी में बदलने के लिए दिन रात एक कर चुकी है। वैसे अभी यह भविष्य के गर्भ में है कि कौन किस पर भारी पड़ेगा या किस गठबंधन की सरकार बनेगी। आंकड़े भले ही कुछ भी कहें लेकिन राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होते। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि मोदी का रथ रोक पाने में यह गठबंधन कितना कारगर साबित होगा।  या कि तमाम किंतु परंतु के बावजूद नीतीश के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनेगी। फिलहाल तो हम यही कह सकते हैं कि तेल देखो और तेल की धार देखो।

आरक्षण की भट्ठी पर सियासी रोटियां

देश के कई प्रमुख समाचारों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह क्या दी, मानो सियासी गलियारों में तूफान आ गया। बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख के आए इस बयान ने जहां भाजपा के हाथ पांव फूला दिये वहीं विपक्षी दलों को बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया। हालांकि संघ की विचारधारा को समाज व देश को बांटने वाला बताने वाली कांग्रेस की तरफ से आश्चर्यजनक तरीके से इस मुद्दे पर समर्थन दिखा। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि गरीबी सबसे बड़ा पिछड़ापन है। अब समय आ गया है कि इसपर बात की जाए कि इस 21वीं सदी में आरक्षण प्रासंगिक है या नहीं। अगर हां, तो आरक्षण का क्या आधार होना चाहिए। सबसे बेहतर तो ये रहेगा कि जाति, समुदाय और धर्म से ऊपर उठकर आरक्षण का आधार आर्थिक किया जाए। बहरहाल, लालू से लेकर मायावती तक और जदयू से लेकर माले तक सभी के सभी दाना पानी लेकर भाजपा व संघ पर चढ़ दौड़े हैं। जंगलराज का तोहमत झेल रहे ये वही लालू प्रसाद यादव हैं जिनके कभी घनिष्ठ सहयोगी रहे रामकृपाल यादव और पप्पू यादव उन पर सामाजिक न्याय की आड़ में परिवारवाद का पोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं। मोहन भागवत ने संघ के मुखपत्र में केवल आरक्षण की जरूरतों व समयसीमा को लेकर समीक्षा करने की बात कही थी। उनका यह कहना आरक्षण को अपनी राजनीतिक  बैसाखी बना चुके इन दलों को गवारा नहीं हुआ। लालू प्रसाद ने सबसे तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने संघ प्रमुख पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो आरक्षण समाप्त कर के दिखाओ। आरक्षण पर राजनीति और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए संघ प्रमुख ने सुझाव दिया था कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को और कितने दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ऐसी समिति में राजनीतिकों से ज्यादा 'सेवाभावियों' का महत्व होना चाहिए। गुजरात में पाटीदार और राजस्थान में गुर्जर सहित कई क्षेत्रों में कई जातियों को आरक्षण देने की बढ़ती मांगों की पृष्ठभूमि में सरसंघचालक का यह बयान बर्र के छत्ते में हाथ डालने वाला साबित हुआ। 'फेसबुक' के अपने वॉल पर तथा ट्वीट कर लालू ने भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए लिखा, मैं डरपोक भाजपाइयों को चैलेंज  देता हूं कि तुम आरक्षण खत्म करने को कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पिया है तो खत्म करके दिखाओ। किसकी कितनी ताकत है, पता चल जाएगा। बिहार में जारी चुनावी घमासान के आलोक में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने आगे लिखा ‘लालू नली-गली में मिट जाएगा परंतु मुट्ठीभर अभिजात्यों का एजेंडा बहुसंख्यक बहुजनों पर लागू नहीं होने देगा।’ लालू यहीं नहीं रुके उन्होंने ट्वीट किया, आरएसएस व भाजपा आरक्षण खत्म करने के लिए कितना भी सुनियोजित माहौल बना ले, देश के 80 प्रतिशत दलित व पिछड़ा इनका मुंहतोड़ करारा जवाब देगा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल करते हुए लिखा, ‘लोकसभा चुनाव में खुद को पिछड़ा बता कर वोट ठगने वाला, तथाकथित चाय बेचने वाला, हाल ही पिछड़ा बने नरेंद्र मोदी बताएं कि वो अपने 'आका' के कहने पर आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं?’ जनता दल यू ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इसे पिछड़ों और वंचितों को कमजोर करने का प्रयास करार देते हुए जदयू के प्रवक्ता के सी त्यागी ने कहा कि मौजूदा आरक्षण नीति में किसी प्रकार की छेड़छाड़ संविधान के खिलाफ है। आरक्षण अभी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है और इस स्थिति में आरक्षण नीति की समीक्षा से निश्चित रूप से पिछड़े एवं कमजोर वर्गों का अहित होगा। उधर मायावती ने भी आरक्षण को संवैधानिक व्यवस्था बताते हुए धमकी दे दी कि अगर इसको हटाने की बात की गई तो देश भर में आंदोलन किया जाएगा। आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार किए जाने के भागवत के सुझाव की विपक्ष द्वारा तीखी आलोचना किए जाने के बीच केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा किए जाने के पक्ष में नहीं है। कैबिनेट की बैठक के बाद केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार और भाजपा दोनों का मत है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता नहीं है। हमारा विश्वास है कि आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक प्रगति के लिए यह आवश्यक है। हालांकि माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य की नजर में भाजपा की असहमति दिखावा है। उनका मानना है कि इसके जरिए भाजपा भ्रम पैदा करने की कोशिशें कर रही है लेकिन बिहार और पूरे देश की जनता संघ परिवार की सामंती-सांप्रदायिक पक्षधरता और दलित-गरीब-पिछड़ा विरोधी रुख से परिचित है। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने भागवत के बयान से सहमति जताते हुए तर्क दिया कि आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट आखें खोलने वाली है क्योंकि इस रिपोर्ट के अनुसार 83 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा 87 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोगों की मासिक आय एक हजार रुपये से भी कम है। तथ्य है कि आरक्षण का लाभ पांच प्रतिशत से भी कम लोगों को मिला है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आजादी के इतने वर्षों तक आरक्षण जारी रहने के बाद भी उसका लाभ कहां चला गया। उत्तर सरल है कि इन जातियों के सम्पन्न लोगों ने ही इसका लाभ उठाया। एक बार मांग उठी थी कि इन वर्गों के सम्पन्न लोगों को आरक्षण का लाभ न दिया जाए। सुझाव उचित तथा महत्वपूर्ण था पर सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया। विभिन्न पार्टियों के कई नेता इसी संपन्न तबके से आते हैं। 
अब सवाल यह है कि भागवत का यह बयान अनायास ही है या फिर सोची समझी रणनीति के तहत। इस संदर्भ में  यहां एक बात का जिक्र करना जरूरी लगता है। लोकसभा चुनाव से पहले मेरी मुलाकात संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी से हुई। उस दौरान मैंने संघ और भाजपा के सबंधों को समझने के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को लेकर उनसे एक प्रश्न पूछा था। प्रश्न का उत्तर देने से पहले उन्होंने जो एक बात कही वह यह कि पूर्व संघ प्रमुख सुदर्शन जी की तरह भागवत जी की जुबान फिसलती नहीं है। मै यह चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि अभी आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख का बयान आया है। अगर जुबान न फिसलने वाली बात सही है तो फिर बिहार विधान सभा चुनाव की पूर्व बेला पर यह बयान अपने पीछे कई सवाल छोड़े जा रहा है।