देश की दुर्दशा देख कर किसी कवि की ये पंक्तियाँ याद आती है --
मौन शंकर मौन चंडी देश में,
हो रहे हावी शिखंडी देश में।।
अपना बौनापन छिपाने के लिए,
बो रहे हैं वो अरंडी देश में।।
भाव की पर्ची लगी हर भाल पर,
हर गली बाजार मंदी देश में।। ------बद्री नाथ वर्मा , कोलकाता