Monday, December 7, 2015

आओ असहिष्णुता-असहिष्णुता खेलें

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
इन दिनों देश के सबसे प्रिय खेल का नाम ‘असहिष्णुता’ है। जिसे देखो वही असहिष्णुता-असहिष्णुता का खेल खेलने में मस्त है। यह असहिष्णुता न होकर मानो लुकाछिपी का खेल हो गया हो। मीडिया की सुर्खियां बटोरने का सबसे सहज तरीका बन चुके इस खेल को हर कोई अपने-अपने तरीके से खेल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल से शुरू हुआ एवार्ड वापसी आंदोलन बिहार चुनाव के बाद मंद पड़ चुका है। साल 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिखों के कत्लेआम के दो वर्ष बाद सन् 1986 में नयनतारा सहगल को पद्मश्री अवार्ड मिला था। क्या सहगल इसका जवाब देना चाहेंगी कि दिल्ली में निरपराध सिखों के गले में टायर डालकर जिंदा जला देने की घटना सहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। जिन राजीव गांधी की सरकार ने उन्हें यह पुरस्कार दिया था उन्हीं राजीव गांधी ने इस कत्लेआम पर टिप्पणी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती डोलती है। दरअसल, यह सब मोदी सरकार को देश दुनिया  में बदनाम करने की गहरी साजिश का एक हिस्सा है। भाजपा व उसके सहयोगियों का भी मानना है कि यह राजनीतिक फायदे के लिए की गई प्रायोजित साजिश थी। असहिष्णुता के नाम पर अरण्य रोदन कर रहे सहिष्णुता के पुजारियों का कलेजा दिल्ली में 3 दिन के अंदर छह हजार सिक्खों के मारे जाने पर क्यों नहीं फटा! क्यों नहीं उनका कलेजा लाखों कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम पर फटा! क्या गोधरा में 59 रामसेवकों के जिन्दा जलाए जाने की घटना सहिष्णुता की परिधि में आती है! दर्जनों ऐसे वाकये हैं। क्या-क्या लिखें...? जयचन्द भी सहिष्णुता के इन पुजारियों के दोहरे मापदंड से शर्मिंंदा होकर कहीं सिर झुकाये आंसू बहा रहा होगा! असहिष्णुता का एहसास मुंबई बम ब्लास्ट, भारतीय संसद पर हमले, बैंगलुरू बम ब्लास्ट और 26-11 इत्यादि के समय भी नहीं हुआ। आखिर क्यों? हत्या चाहे अखलाक की हो या फिर कैप्टन संतोष महादिक की। हत्या तो हत्या है। मगर विडंबना देखिए कि इसे भी राजनीतिक नफे-नुकसान के चश्मे से देखा जाता है। दोहरा मापदंड अपनाने वाले हमारे राजनेताओं से लेकर मीडिया के मठाधीशों की आत्मा को चुनिंदा मामले ही झकझोरते हैं। दादरी कांड को लेकर आसमान सिर पर उठाने वालों के पास कश्मीर में आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक की संवेदना में बोलने को दो शब्द तक नहीं हैं। दादरी में लगभग सभी दलों के नेताओं ने सिजदा किया, लेकिन देश के लिए शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक को अंतिम विदाई देने के लिए रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के अतिरिक्त एक भी सियासतदां नहीं पहुंचा।    
बहरहाल, असहिष्णुता का खेल खेलकर अभी शाहरूख खान निपटे ही थे कि बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान ने एंट्री मार दी। उनकी पत्नी किरण को पिछले छह महीनों में घटी कुछ घटनाओं की वजह से अब इस देश में डर लगने लगा है। वह अपने बच्चों के हित में किसी और देश में बसने के लिए आमिर पर दबाव बना रही हैं। आमिर के मुताबिक पिछले 6 महीनों में लोगों में डर और असुरक्षा की भावना बढ़ी है। देश का सामाजिक तानाबाना इस समय पूरी तरह ठीक नहीं है। इस तरह के माहौल को देखते हुए एक बार उनकी पत्नी किरण ने उनसे देश छोड़ने तक की बात कह दी थी। वह आसपास के माहौल से चिंतित थीं। रोजाना अखबार खोलते हुए भी उन्हें डर लगता है। बच्चों की फिक्र में पहली बार उन्होंने इतनी बड़ी बात कह दी थी। आमिर सही कह रहे हैं। मैं भी उनके स्वर में अपना स्वर मिलाता हूं क्योंकि अगर किसी हिन्दू बहुसंख्यक देश के तीन सबसे बड़े सुपरस्टार मुस्लिम हो सकते हैं तो यह अपने आप में साबित करता है कि देश के बहुसंख्यक वाकई असहिष्णु हैं। वैसे तथ्य यह भी है कि आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ अगले महीने सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। ऐसे में अधिकतर लोगों का मानना है कि आमिर का यह बयान फिल्म प्रमोशन का एक हिस्सा है। हालांकि उनके बयान के बाद तल्ख टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने आमिर को सबसे करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आमिर डर रहे हैं या दूसरों को डरा रहे हैं। आमिर पर तंज कसते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा, ‘दुनिया में भारत से अच्छा देश कोई और नहीं मिलेगा। भारत के मुस्लिमों के लिए हिंदुस्तान से अच्छा देश और हिंदुओं से अच्छा पड़ोसी नहीं मिलेगा। आज सीरिया, तुर्की, जॉर्डन, ईरान, इराक में क्या हालात हैं? हिंदुस्तान में पूरे अरब देशों से ज्यादा मुस्लिम हैं और उन्हें बराबर का हक मिला हुआ है। अपने मन में भ्रम मत रखो। कहां जाओगे। जहां जाइएगा असहिष्णुता पाइएगा। भारत में किसी की जाति और धर्म देखे बिना लोग कलाकारों को पसंद करते हैं।’ वहीं, अनुपम खेर ने आमिर खान से पूछा कि क्या आपने किरण से पूछा कि वह भारत छोड़कर किस देश में जाना चाहेंगी। क्या आपने उन्हें बताया कि यह वही देश है जिसने आपको आमिर खान बनाया है। साक्षी महाराज भी भला कहां चूकने वाले थे। उन्होंने भी दनादन सवाल दाग दिये। आमिर खान बताएं कि भारत अच्छा नहीं लगता है तो क्या उनको ईरान, इराक अच्छा लगता है? क्या उनको औरंगजेब का शासन अच्छा लगता है? क्या उन्हें तालिबानी देश अच्छा लगता है? बहरहाल, जो भी हो पीएम मोदी अभी भी बहुतों को हजम नहीं हो पा रहे हैं।

पिद्दी साबित हुए दिल्ली के सूरमा

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार के मतदाताओं ने जदयू, राजद और कांग्रेस के पक्ष में अपना जनादेश दे दिया। यह जनादेश करीब 19 माह पहले हुए लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलहदा साबित हुआ। कुछ महीनों के भीतर आये इस फैसले में कई संदेश छुपे हुए हैं। ये संदेश बिहार की राजनीति से लेकर केंद्रीय राजनीति से सरोकार रखने वाले हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भारत में एक नये राजनीतिक व्याकरण की रचना की है। तमाम आकलन और अनुमानों को धत्ता बताते हुए नीतीश कुमार नीत महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) ने चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले राजग को करारी शिकस्त दी है। एनडीए द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा प्रस्तुत नहीं करना, बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेताओं के मोदी विरोधी सुर, मोहन भागवत का आरक्षण वाला बयान, महंगाई की मार, गाय व बीफ की राजनीति जैसी अन्य कई बातें भाजपा को ले डूबी। भाजपा के लिए यह न भूलने वाला चुनाव होगा। 243 सदस्यीय सदन में 178 सीटें जीतकर महागठबंधन ने जहां अपना किला मजबूत किया, वहीं अपना सब कुछ दांव पर लगाकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ सिर्फ 58 सीटें लगीं। लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 31 सीटें जीतने वाले भाजपा गठबंधन को विधानसभा चुनाव में ‘महा-हार’ का सामना करना पड़ा। वहीं, लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों करारी शिकस्त का मलाल धोते हुए महागठबंधन ने आंखें चौंधिया देने वाला प्रदर्शन किया। समझा जा रहा है कि बिहार में आए चुनाव परिणामों से दिल्ली की राजनीति में भी व्यापक असर देखने को मिलेगा। जैसा कि लालू प्रसाद यादव ने कहा भी है कि नीतीश बिहार देखेंगे और वे देश। बेशक राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश व लालू का कद बढ़ेगा।
भाजपा को सबसे तगड़ा झटका उसके सहयोगियों की तरफ से मिला, जो 87 सीटों पर चुनाव लड़े और केवल पांच पर जीत दर्ज कर सके। भाजपा को उम्मीद थी कि वह राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा के जरिये दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वोटों में सेंध लगा पायेगी लेकिन ऐसा हो न सका। पासवान और आरएलएसपी को जहां दो-दो सीटें नसीब हुईं वहीं मांझी की पार्टी को तो सिर्फ एक ही जीत से संतोष करना पड़ा। पिछले वर्ष मई में लोकसभा चुनाव में प्रचंड वेग के साथ अपनी पार्टी का विजयरथ हांकने वाले मोदी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर में अकेले या गठबंधन सरकार बनाई। इस बात को ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस, राजद और जदयू का सूपड़ा साफ करके राज्य की 40 में से 31 सीटें जीती थीं। इस जीत ने राजनीति के एक कुटिल सिद्धांत कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, को सतह पर ला दिया और इन तीनों पराजित योद्धाओं ने मोदी के खिलाफ कमर कस ली। एक महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में तीनों दलों ने थोड़े संकोच के साथ हाथ मिलाया, लेकिन 10 में से 6 सीटों पर जीत ने तीनों पार्टियों को एक होने का हौंसला दिया और उसी का नतीजा था कि मोदी के सामने लोकसभा चुनाव में पिद्दी साबित हुई पार्टियां मोदी को ही बौना करने में कामयाब रहीं।
इस महाविजय के साथ बिहार की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने फिर से अपनी रणनीति का लोहा मनवा दिया है और भारी जीत दर्ज कर वह एक बार फिर से प्रदेश के चंद्रगुप्त बनने जा रहे हैं। नीतीश की यह लगातार तीसरी जीत है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इस सदियों पुरानी कहावत का अनुसरण करते हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की 40 सीटों में से मात्र दो सीटों पर जीत हासिल करने के बाद जनता दल यू नेता नीतीश कुमार ने अपने कट्टर दुश्मन नरेंद्र मोदी रूपी तूफान को रोकने के लिए लालू से गलबहियां डालीं। राज्य की राजनीति में दोस्त से दुश्मन और फिर दोस्त बने लालू और नीतीश ने अपने अपने मतभेदों को भूलाकर 40 साल पुराने छात्र आंदोलन के जमाने के गठबंधन को फिर से खड़ा किया। इसी छात्र आंदोलन की सीढ़ी पर चढ़कर 1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कूदे लालू की किस्मत रंग लायी और वह चुनाव जीत गए। लेकिन उनके साथी नीतीश कुमार को 1985 में राज्य विधानसभा चुनाव में पहली बार जीत हासिल करने में आठ साल लग गए। 1985 से पहले नीतीश दो बार चुनाव हार गए थे। नीतीश कुमार ने 1989 में बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए लालू का समर्थन किया। बारा से 1989 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले नीतीश कुमार ने अपनी नजरें राज्य की राजनीति से हटाकर अब दिल्ली पर केंद्रित कर दी थीं और वह 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में भी विजयी रहे। नीतीश ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री और 1999 में कुछ समय के लिए रेल मंत्री का पदभार संभाला। सौम्य  नीतीश कुमार वर्ष 2001 में फिर से रेल मंत्री बने और 2004 तक इस पद की कमान संभाली। रेल भवन में उनके आसीन रहने के दौरान ही फरवरी 2002 में गोधरा ट्रेन कांड हुआ, जिसने जल्द ही गुजरात को सांप्रदायिक आग के लपेटे में ले लिया। दिल्ली में सत्ता के गलियारों में नीतीश अपने राजनीतिक और प्रशासनिक कौशल को मांजने में लगे रहे और इस कारण वह लालू से दूर होते चले गए। 
बहरहाल, बिहार विजय के बाद भाजपा की खिलाफत वाली राजनीति के केंद्र में इनकी अहमियत भी बढ़ेगी। इस लिहाज से कहा जाये तो बिहार के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगह थी। अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद उत्तर प्रदेश की बारी है। महागंठबंधन को मिला विजय चौंका देने वाला है। उसकी जीत का आंकड़ा 178 तक पहुंच गया। जिस तरह से बिहार के इस चुनाव में केंद्र सरकार ने अपनी ऊर्जा खर्च की, ऐसा उदाहरण राज्यों के चुनाव में प्राय: नहीं देखा गया है। इस पूरे अभियान का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर किया। उनकी मदद अमित शाह और भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं ने की। इसकी तुलना में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी ने इसका जवाब 1990 के दशक के सामाजिक न्याय के मुद्दे को फिर से उठाकर दिया। जब बिहार में चुनाव की घोषणा हुई थी, तब महागंठबंधन व्यवस्थित नहीं था। बहरहाल, केन्द्र सरकार की भारी भरकम रणनीति के सामने क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी कौशल भारी रहा। कुल मिलाकर नीतीश का यह नारा कामयाब रहा-बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है।

इकॉनामी के लिए ‘रामबाण’ है जीएसटी

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों पर प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार चुनाव में मिली भारी पराजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बात का आभास है कि संसद का शीतकालीन सत्र काफी हंगामेदार होगा। 4 सीटों से 27 सीटों पर बिहार में पहुंची कांग्रेस को इस चुनाव ने नया जीवनदान दे दिया है। ऐसे में वह मोदी सरकार की फजीहत करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखने वाली है। वह मोदी सरकार की योजनाओं को पलीता लगाने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहेगी। ऐसे में महत्वाकांक्षी जीएसटी बिल के बहाने कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार की बांह उमेठने से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चाय पर आमंत्रित कर कुशल रणनीतिकार के रूप में खुद को साबित किया है। कहा जा रहा है कि इस चाय पर चर्चा के दौरान जीएसटी बिल पर कांग्रेस ने समर्थन का भरोसा दिया लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दोबारा इसमें फच्चर फंसा दिया। वह इसमें तीन सुधार चाहते हैं। जबकि सच यह है कि अगर राहुल की बात मान ली जाए तो फिर जीएसटी के कोई मायने मतलब ही नहीं रह जाएंगे। बहरहाल, तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत अन्य कई दलों ने जीएसटी बिल को देशहित में मानते हुए अपने समर्थन का ऐलान कर दिया है। इससे सरकार को थोड़ी सी राहत मिली हुई है। गौरतलब है कि जीएसटी बिल लोकसभा से पास हो चुका है लेकिन राज्यसभा में अटका पड़ा है। चूंकि उच्च सदन में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं है इसलिए बिल को पास कराने के लिए अन्य विपक्षी दलों का सहयोग जरूरी है। वैसे आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल पुथल और मांग में गिरावट के बीच संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में वस्तु एवं सेवा कर विधेयक का पारित होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘रामबाण’ साबित हो सकता है। 
एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी के लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार में लगभग दो प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अगर सरकार बुनियादी ढांचे पर जोर देना जारी रखती है तो वर्ष 2018-19 तक यह आंकड़ा नौ प्रतिशत तक पहुंच सकता है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि अगले दो तीन सालों में जीडीपी दो अंकों में पहुंच जाएगी। यह सौ प्रतिशत सही है कि जीएटी के लागू होने से केंद्र तथा राज्य के कुल राजस्व में भी भारी इजाफा होगा। बावजूद इसके राजनीतिक गुणा भाग के तहत जीएसटी पर सियासत हो रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी विधेयक के पारित होने से सरकार विदेशी निवेशकों को यह संदेश देने में कामयाब होगी कि आर्थिक सुधारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता बनी हुई है और ये उसकी प्राथमिकता में हैं तथा वह घरेलू स्तर पर आर्थिक चुनौतियों से निपट सकती है। 
संसद के पिछले सत्र में कोई विधायी कामकाज नहीं होने के कारण सदन का काम सुचारु रूप से चलाने का जिम्मा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद संभाला है। इसके लिए वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले है और विपक्षी नेताओं के साथ मेलजोल बढ़ा रहे हैं। जीएसटी लोकसभा में पारित हो चुका है जबकि विपक्ष के विरोध के कारण राज्यसभा में लंबित है। विश्लेषकों के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जीएसटी को पारित करने का यह सही समय है और देश की आर्थिक स्थिति इसमें देर करने की हालत में नहीं है। पेरिस आतंकवादी हमले के बाद विश्व की राजनीतिक स्थिति भी बदल रही है। इस हमले और इसके बाद की घटनाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंद किया है। यूरोप, चीन और जापान में पहले ही मंदी का दौर चल रहा है। इसका असर देर सबेर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। ऐसे में जरूरी है कि सियासत को एक किनारे रखकर देशहित में इस बिल को सभी दल मिलकर पारित करायें। राजनीति करने के लिए बहुत सारा समय शेष है। जीएसटी के लागू होने से कर संग्रहण की जटिलताएं दूर होगीं और अप्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाया जा सकेगा। इससे उत्पादन की लागत में कमी आएगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा जिससे उनकी क्रय क्षमता बढ़ेगी। मुद्रास्फीति में भी कमी आएगी। जीएसटी को पारित करने में राजनीतिक दलों की एकजुटता से घरेलू और विदेशी निवेशकों में सकारात्मक संदेश जाएगा जिसकी अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए सख्त जरूरत है। जानकारों का कहना है कि जीएसटी को पारित करने के लिए सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने मतभेद दूर करने चाहिए। सरकार को अपनी ओर से इनकी समस्याओं का निराकरण करते हुए बीच का रास्ता निकालना चाहिए। 
फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। सरकार के कई प्रयासों के बावजूद देश में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है। देश के उद्योगों की धड़कन माने जाने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सितंबर में चार महीने के न्यूनतम स्तर 3.6 प्रतिशत पर आ गया है। लगातार दो सालों से मानसून के कमजोर होने से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घट रही है। इससे कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में मांग प्रभावित हो रही है। खाद्य पदार्थों की उच्च मुद्रास्फीति से भी सेवा क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र की मांग घट रही है। समय आ गया है कि देशहित पर सियासत को तवज्जो देने की परिपाटी बंद हो। सिर्फ एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए या फिर श्रेय किसी दूसरे को मिल रहा है इस कारण से किसी बिल को पारित न होने देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। सियासत में विरोध जायज है लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध हो यह किसी भी तरह से उचित नहीं है।