देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
इन दिनों देश के सबसे प्रिय खेल का नाम ‘असहिष्णुता’ है। जिसे देखो वही असहिष्णुता-असहिष्णुता का खेल खेलने में मस्त है। यह असहिष्णुता न होकर मानो लुकाछिपी का खेल हो गया हो। मीडिया की सुर्खियां बटोरने का सबसे सहज तरीका बन चुके इस खेल को हर कोई अपने-अपने तरीके से खेल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल से शुरू हुआ एवार्ड वापसी आंदोलन बिहार चुनाव के बाद मंद पड़ चुका है। साल 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिखों के कत्लेआम के दो वर्ष बाद सन् 1986 में नयनतारा सहगल को पद्मश्री अवार्ड मिला था। क्या सहगल इसका जवाब देना चाहेंगी कि दिल्ली में निरपराध सिखों के गले में टायर डालकर जिंदा जला देने की घटना सहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। जिन राजीव गांधी की सरकार ने उन्हें यह पुरस्कार दिया था उन्हीं राजीव गांधी ने इस कत्लेआम पर टिप्पणी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती डोलती है। दरअसल, यह सब मोदी सरकार को देश दुनिया में बदनाम करने की गहरी साजिश का एक हिस्सा है। भाजपा व उसके सहयोगियों का भी मानना है कि यह राजनीतिक फायदे के लिए की गई प्रायोजित साजिश थी। असहिष्णुता के नाम पर अरण्य रोदन कर रहे सहिष्णुता के पुजारियों का कलेजा दिल्ली में 3 दिन के अंदर छह हजार सिक्खों के मारे जाने पर क्यों नहीं फटा! क्यों नहीं उनका कलेजा लाखों कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम पर फटा! क्या गोधरा में 59 रामसेवकों के जिन्दा जलाए जाने की घटना सहिष्णुता की परिधि में आती है! दर्जनों ऐसे वाकये हैं। क्या-क्या लिखें...? जयचन्द भी सहिष्णुता के इन पुजारियों के दोहरे मापदंड से शर्मिंंदा होकर कहीं सिर झुकाये आंसू बहा रहा होगा! असहिष्णुता का एहसास मुंबई बम ब्लास्ट, भारतीय संसद पर हमले, बैंगलुरू बम ब्लास्ट और 26-11 इत्यादि के समय भी नहीं हुआ। आखिर क्यों? हत्या चाहे अखलाक की हो या फिर कैप्टन संतोष महादिक की। हत्या तो हत्या है। मगर विडंबना देखिए कि इसे भी राजनीतिक नफे-नुकसान के चश्मे से देखा जाता है। दोहरा मापदंड अपनाने वाले हमारे राजनेताओं से लेकर मीडिया के मठाधीशों की आत्मा को चुनिंदा मामले ही झकझोरते हैं। दादरी कांड को लेकर आसमान सिर पर उठाने वालों के पास कश्मीर में आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक की संवेदना में बोलने को दो शब्द तक नहीं हैं। दादरी में लगभग सभी दलों के नेताओं ने सिजदा किया, लेकिन देश के लिए शहीद हुए कैप्टन संतोष महादिक को अंतिम विदाई देने के लिए रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के अतिरिक्त एक भी सियासतदां नहीं पहुंचा।
बहरहाल, असहिष्णुता का खेल खेलकर अभी शाहरूख खान निपटे ही थे कि बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान ने एंट्री मार दी। उनकी पत्नी किरण को पिछले छह महीनों में घटी कुछ घटनाओं की वजह से अब इस देश में डर लगने लगा है। वह अपने बच्चों के हित में किसी और देश में बसने के लिए आमिर पर दबाव बना रही हैं। आमिर के मुताबिक पिछले 6 महीनों में लोगों में डर और असुरक्षा की भावना बढ़ी है। देश का सामाजिक तानाबाना इस समय पूरी तरह ठीक नहीं है। इस तरह के माहौल को देखते हुए एक बार उनकी पत्नी किरण ने उनसे देश छोड़ने तक की बात कह दी थी। वह आसपास के माहौल से चिंतित थीं। रोजाना अखबार खोलते हुए भी उन्हें डर लगता है। बच्चों की फिक्र में पहली बार उन्होंने इतनी बड़ी बात कह दी थी। आमिर सही कह रहे हैं। मैं भी उनके स्वर में अपना स्वर मिलाता हूं क्योंकि अगर किसी हिन्दू बहुसंख्यक देश के तीन सबसे बड़े सुपरस्टार मुस्लिम हो सकते हैं तो यह अपने आप में साबित करता है कि देश के बहुसंख्यक वाकई असहिष्णु हैं। वैसे तथ्य यह भी है कि आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ अगले महीने सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। ऐसे में अधिकतर लोगों का मानना है कि आमिर का यह बयान फिल्म प्रमोशन का एक हिस्सा है। हालांकि उनके बयान के बाद तल्ख टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने आमिर को सबसे करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आमिर डर रहे हैं या दूसरों को डरा रहे हैं। आमिर पर तंज कसते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा, ‘दुनिया में भारत से अच्छा देश कोई और नहीं मिलेगा। भारत के मुस्लिमों के लिए हिंदुस्तान से अच्छा देश और हिंदुओं से अच्छा पड़ोसी नहीं मिलेगा। आज सीरिया, तुर्की, जॉर्डन, ईरान, इराक में क्या हालात हैं? हिंदुस्तान में पूरे अरब देशों से ज्यादा मुस्लिम हैं और उन्हें बराबर का हक मिला हुआ है। अपने मन में भ्रम मत रखो। कहां जाओगे। जहां जाइएगा असहिष्णुता पाइएगा। भारत में किसी की जाति और धर्म देखे बिना लोग कलाकारों को पसंद करते हैं।’ वहीं, अनुपम खेर ने आमिर खान से पूछा कि क्या आपने किरण से पूछा कि वह भारत छोड़कर किस देश में जाना चाहेंगी। क्या आपने उन्हें बताया कि यह वही देश है जिसने आपको आमिर खान बनाया है। साक्षी महाराज भी भला कहां चूकने वाले थे। उन्होंने भी दनादन सवाल दाग दिये। आमिर खान बताएं कि भारत अच्छा नहीं लगता है तो क्या उनको ईरान, इराक अच्छा लगता है? क्या उनको औरंगजेब का शासन अच्छा लगता है? क्या उन्हें तालिबानी देश अच्छा लगता है? बहरहाल, जो भी हो पीएम मोदी अभी भी बहुतों को हजम नहीं हो पा रहे हैं।