इंडियन पालिटिकल लीग ( राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित )
इंट्रो : जिन राजनेताओं को देश के विकास और दूसरे अहम कार्यों के चुना गया है वे अपना पूरा समय क्रिकेट में खपा रहे हैं। खेल से जुड़े सभी मलाईदार पदों पर राजनेताओं का ही है कब्जा।
खेल के नाम पर मजाक बन गया है आईपीएल : कीर्ति आजाद
वक्त आ गया है कि खेल के नाम पर खिलवाड़ को रोका जाए : लालू प्रसाद यादव
आईपीएल की आड़ में काले धन का खेल चल रहा है : सुब्रमण्यम स्वामी
खेल मंत्री अजय माकन ने आईपीएल में सैकडों करोड़ के टैक्स चोरी और ब्लैक मनी लगे होने की आशंका जताई है
आखिर ऐसा क्या है क्रिकेट में जो राजनेताओं को भी अपनी ओर खींचता है। आज देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस व भाजपा के लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक बड़े चेहरे क्रिकेट बोर्ड के विभिन्न मलाईदार पदों पर काबिज हैं। ये राजनेता क्रिकेट बोर्ड में अर्से से राजनीति कर रहे हैं और अपने रसूख व जोड़-तोड़ से लगातार विभिन्न क्रिकेट संघों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। कहने को क्रिकेट बोर्ड की तरफ से इन्हें वेतन तो नहीं मिलता पर इनके जलवे देखने लायक होते हैं। हर कोई मुंह बाये रहता है बोर्ड पर कब्जे के लिए। हर तोड़-तिकड़म आजमाये जाते हैं। हर राजनीतिक, राजनीति से ज्यादा समय क्रिकेट को देने के लिए उत्सुक रहता है। चाहे वह कृषिमंत्री शरद पवार हों या फिर भाजपा के चमकते सितारे अरुण जेटली। बढ़ती मंहगाई और देश में अकाल की स्थिति के दौरान भी केंद्रीय कृषिमंत्री क्रिकेट के लिए वक्त निकाल ही लेते हैं। अगर राज्यसभा में विरोधी दल के नेता अरुण जेटली की बात की जाए तो वह भी क्रिकेट के व्यामोह से खुद को दूर रख पाने में अपने को अक्षम पाते हैं। वह पार्टी के संकटमोचक के रूप में इन दिनों खासी चर्चा बटोर रहे हैं। बावजूद इसके क्रिकेट का लोभ ऐसा है कि संभाले नहीं संभलता। आज क्रिकेट में बस पैसा ही पैसा है। लाखों या करोड़ों की नहीं, हजारों करोड़ की बात हो रही है। हजार करोड़ रुपये का तो सट्टा लगने लगा है। क्रिकेट में राजनेताओं को दौलत के अतिरिक्त जो चीज सबसे ज्यादा लुभाती है वह है सेक्स और शराब। दुर्भाग्यवश आईपीएल की पहचान सेक्स, शराब और दौलत बनता जा रहा है। इसी के साथ कोढ़ में खाज यह कि राजनेताओं के इसमें हद से अधिक दिलचस्पी लेने की वजह से यह राजनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है।
आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग लोगों की नजर में इंडियन पालिटिक्स लीग या इंडियन पॉवर लीग बनता जा रहा है। शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने तो इसे इंडियन पियक्कड़ लीग का संबोधन दे डाला है। दरअसल शराब व शबाब के ग्लैमर से परिपूर्ण क्रिकेट फुल मस्ती उपलब्ध करा रहा है। आईपीएल में कालाधन लगे होने के भी आरोप लगातार लगते रहे हैं। एक के बाद एक लगातार आईपीएल के दामन पर दाग लगते जा रहे हैं। खेल पर सट्टे का खुलासा, वानखेड़े में शाहरुख कांड और अब एक खिलाड़ी पर सबसे घिनौना दाग। अब तो खुद खेल मंत्री ने भी कह दिया है कि आईपीएल के खेल में काले धन के इस्तेमाल का बड़ा शक है। जाहिर है आईपीएल के वजूद पर सवाल तो उठते ही हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस डर्टी गेम को खत्म कर देना चाहिए। हर हलके से एक सुर में आवाज उठने लगी है कि क्रिकेट के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को बंद करो। यह खेल सेक्स, दौलत और राजनीति यानी तीन का तड़का बन गया है।
नई प्रतिभाओं को पहचान देने के नेक उद्देश्य से शुरू हुआ आईपीएल आज इस स्थिति में पहुंच गया है कि इस पर पाबंदी लगाये जाने की मांग उठने लगी है। पूर्व क्रिकेटर व भारतीय जनता पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद तो इस पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन भी कर चुके हैं। इसी के साथ उन्होंने संसद में भी इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि वैचारिक रूप से उनके धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव ने भी उनका इस मुद्दे पर समर्थन किया। वहीं क्रिकेट में राजनेताओं की बढ़ती राजनीति पर चिंता जताते हुए खुद खेल मंत्री अजय माकन भी इसे शुभ संकेत नहीं मानते। उन्होंने कहा है कि राजनेताओं को खेल संघों से दूर ही रहना चाहिए। जबकि खेल के नाम पर हो रहे खिलवाड़ पर लालू प्रसाद यादव ने भी अपना विरोध जता दिया है। इस सबको देखते हुए समाज के विभिन्न वर्गों से आईपीएल पर रोक लगाने की मांग भी उठने लगी है। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि आईपीएल की आड़ में काले धन का खेल चल रहा है। अगर आईपीएल को जारी भी रखना है तो इससे राजनेताओं और बॉलीवुड कलाकारों को दूर करने की जरूरत है। जनता पार्टी के अध्यक्ष कहते हैं कि यह क्रिकेट का डर्टी गेम है। इसे फौरन बंद होना चाहिए। जाहिर है, आईपीएल पर सवाल उठे हैं और जवाब उसी के अफसरों को देना होगा। लेकिन हर विवाद पर कन्नी काट जाते हैं आईपीएल के कमिश्नर राजीव शुक्ला।
यह सचमुच ही दुखद है कि कृषिमंत्री को कर्ज तले दबे किसानों की आत्महत्या या फिर गोदामों के अभाव में सड़ते गेहूं और अन्य खाद्दान्न उतने विचलित नहीं करते जितनी चिंता उन्हें क्रिकेट की रहती है। भले ही देश के कुछ भागों में लोग भूखे मर रहे हों। इससे भी उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वे इन फालतू की चीजों में माथापच्ची करने के बजाय क्रिकेट में रुचि लेना ज्यादा पसंद करते हैं। यहां तक कि उनके खुद के गृहराज्य महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में कर्ज तले दबे किसान अपनी इहलीला समाप्त करते जा रहे हैं। बावजूद इसके किसानों की दशा सुधारने, उनके लिए कुछ करने की बजाय वह क्रिकेट की राजनीति में ही ज्यादा उलझे रहते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिरकार ऐसा क्या है क्रिकेट में कि लोग जिस काम को करने के लिए अधिकृत हैं वह अपने कर्तव्य से विमुख होकर क्रिकेट के पीछे मरे जा रहे हैं। अभी पिछले दिनों मुंबई क्रिकेट संघ के चुनाव में विलासराव ने जीत दर्ज की। चूंकि शरद पवार आईसीसी के सर्वेसर्वा होने के कारण मुंबई क्रिकेट संघ का चुनाव तकनीकी रूप से नहीं लड़ सकते थे। इसलिए अपने छाया उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने विलासराव देशमुख को यह चुनाव लड़वाया था। इस तरह एक और राजनेता का क्रिकेट की राजनीति में पदार्पण हो गया। वैसे तो इस पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है और न ही ऐसा कोई नियम ही है कि नेता किसी सोसाइटी या निजी संस्था में पद नहीं संभाल सकते। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि क्रिकेट बोर्ड किसी भी पदाधिकारी को वेतन नहीं देता। फिर भी शरद पवार, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी व राजीव शुक्ला जैसे व्यस्त राजनेता अपना अच्छा-खासा समय बोर्ड को देते हैं। वेतन नहीं मिलता फिर भी इन नेताओं/पदाधिकारियों के फाइव स्टार होटलों की बैठकों में लाखों रुपये रोज खर्च किए जाते हैं। वर्तमान में सरकार के तीन मुख्यमंत्री बोर्ड से जुड़ हुए हैं। शरद पवार आइसीसी के चेयरमैन भी हैं व दुबई दफ्तर से क्रिकेट पर नियंत्रण बनाए हुए हैं। दिल्ली में मंत्रालय का कामकाज देखने की बजाय मुंबई की क्रिकेट राजनीति में उनकी दिलचस्पी ज्यादा रहती है। राजीव शुक्ला का काम ही क्रिकेट विवादों को निपटाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह देश के साथ धोखा नहीं है कि सरकार के वरिष्ठ मंत्री मंत्रालयों का कामकाज करने के बजाय क्रिकेट की राजनीति में ज्यादा मशगूल हैं। यह वाकई बहस का विषय है। इसमें कोई शक नहीं है कि ये राजनेता/पदाधिकारी भारतीय क्रिकेट को पूरी तरह नियंत्रित किए हुए हैं। आरोप तो यहां तक लगाये जा रहे हैं कि दरअसल नेताओं की नजर बोर्ड की अकूत कमाई पर लगी रहती है। वे इस पर कब्जा जमाकर अपनी-अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना चाहते हैं।
पिछले एक दशक में बोर्ड ने तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की आय की है। आइपीएल में हुए एक हजार करोड़ रुपये का घोटाला भले ही दब गया, लेकिन सच्चाई यह है कि शरद पवार उस समय बीसीसीआइ को अपने हिसाब से चला रहे थे। फ्रेंचाइजीधारक आइपीएल खरीदने में काला धन लगा रहे हैं। ललित मोदी, पवार के इशारों पर ही आइपीएल की फ्रेंचाइजी बांट रहे थे। जब घोटाला पकड़ में आया तो मोदी को कसूरवार मानकर ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया गया। कुल मिलाकर क्रिकेट बोर्ड में नेताओं की भागीदारी ने जितना इस खेल का सत्यानाश किया है। उतना किसी ने भी नहीं किया है।
क्या कहते हैं खेल मंत्री
केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन का मानना है कि राजनेताओं को क्रिकेट से दूर रहना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या यह बात आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला जैसे उनकी पार्टी के नेताओं के पर भी लागू होती है।
उन्होंने कहा 'मेरे साथियों समेत सभी राजनेताओं को क्रिकेट के संचालन से दूर रहना चाहिए। खेल का संचालन उन लोगों को करना चाहिए जो उसके बारे में जानकारी रखते हों और जिनमें प्रबंधन की क्षमता हो।Ó माकन ने कहा 'वे लोग जो क्रिकेट के बारे में कुछ नहीं जानते, जिन्हें बल्ला पकडऩा तक नहीं आता। उनके लिए अच्छा है कि वह क्रिकेट से न जुड़ें।Ó इंडियन प्रीमियर लीग में स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे के बारे में उन्होंने कहा 'मैंने पहले भी कहा है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड 'बीसीसीआईÓ को इस मामले की तह तक जाना होगा। उनके अनुसार यह मामला एक बड़ी चुनौती होने के साथ-साथ एक ऐसा मौका भी है जिससे बीसीसीआई को इस खेल में मैच फिक्सिंग का सफाया करने में मदद मिलेगी। उसे जल्द से जल्द यह मुद्दा सुलझा लेना चाहिए।Ó उन्होंने कहा कि 'केवल पांच खिलाडिय़ों को निलंबित करने से कुछ नहीं होगा। बीसीसीआई को इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान निकालना होगा।Ó
बाक्स आइटम
क्रिकेट के गुड़ पर भिनभिनाने वाले राजनेताओं की फेहरिस्त लंबी है। इनमें से कुछ का ब्यौरा : शरद पवार (आईसीसी के चेयरमैन), राजीव शुक्ला (उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ व आईपीएल कमिश्नर ), यशवंत सिन्हा (टेनिस), विजय मल्होत्रा (तीरंदाजी), जगदीश टायटलर (जुडो), अरुण जेटली (दिल्ली क्रिकेट संघ), नरेंद्र मोदी (गुजरात क्रिकेट संघ), रमन सिंह (छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ), अनुराग ठाकुर ( हिमाचल क्रिकेट, ओलंपिक संघ ) सुरेश कलमाड़ी (ओलंपिक), प्रफुल्ल पटेल (फुटबाल), विलासराव देशमुख (मुंबई क्रिकेट संघ ), ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ ), फारूख अब्दुल्ला (जम्मू एवं कश्मीर क्रिकेट संघ ),सुखदेव सिंह ढींढसा (पंजाब ओलंपिक संघ), रोकबुल हुसैन (असम ओलंपिक संघ ), अभय सिंह चौटाला (बॉक्सिंग), अखिलेश दास (बैडमिंटन, उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ), बिरेन्द्र प्रताप वैश्य (वेटलिफ्टिंग), तरुण गोगोई (असम क्रिकेट संघ), जे पी नद्दा ( हिमाचल ओलंपिक संघ), रमेश मेंडोला (मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ ), बिजोय कोइजम (मणिपुर ओलंपिक संघ), लाल थांह्वाला (मिजोरम ओलंपिक संघ), नेइफिउ रिओ (नागालैंड ओलंपिक संघ), समीर डे (उड़ीसा ओलंपिक संघ), सी पी जोशी (राजस्थान क्रिकेट संघ ), दयानंद नार्वेकर (गोवा क्रिकेट संघ) आदि। इनके अलावा पंजाब के आई एस बिंद्रा, विदर्भ के प्रकाश दीक्षित, सौराष्ट्र के भारत शाह, बंगाल के जगमोहन डालमिया, केरल के टी आर बालाकृष्णन, झारखंड के अमिताभ चौधरी, आंध्र प्रदेश के डी वी सुब्बाराव समेत सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी किसी राज्य या राष्ट्रीय स्तर का कोई भी खेल नहीं खेला है सिवाय खेल संघों में बैठ कर खेल से खिलवाड़ करने के।
बीसीसीआई में काबिज एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला, अरुण जेटली जैसे लोगों के पास और देश के विकास से संबंधित और भी कई काम है मसलन वकालत, उद्योग, देशवासियों का विकास वगैरह, वगैरह। पूर्व क्रिकेटर जो सन्यास के बाद खाली बैठे हैं वो इस खेल को इन राजनेताओं की अपेक्षा कहीं बेहतर ढंग से समझते भी हैं और भारतीय क्रिकेट को ज्यादा समय भी दे सकते हैं। वे क्रिकेट को रुपया बनाने की मशीनरी बनाने की जगह खेल में सुधार कर कहीं बेहतर योगदान दे सकते हैं।