Monday, August 13, 2012

साधु + सियासत =फिसड्डी


साधु + सियासत =फिसड्डी (राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)

योग के बलबूते विश्वविख्यात हुए बाबा रामदेव के शिविरों में जुटती भीड़ ने बाबा रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जगा दिया। और अपने तीखे बयानों से मीडिया की लाइम लाइट में बने रहने में सिद्धहस्त बाबा बाकायदा भारत स्वाभिमान के नाम से एक संगठन बनाकर राजनीतिक अखाड़े में उतर चुके हैं। इससे जहां राजनीतिक हलकों में बेचैनी  है, वहीं दूसरी ओर खुद बाबा के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
वैसे अगर अतीत को आधार बनाया जाय तो उनसे पहले भी कुछ संतों ने राजनीतिक पारी खेलने की भरपूर कोशिश की। यह बात अलग है कि उनकी उम्मीदें परवान नहीं चढ़ पाई। जनता ने चुनावी मैदान में उन्हें टिकने नहीं दिया। दरअसल, जब तक संत आध्यात्मिक क्रियाकलापों तक सीमित रहे तब तक तो जनता ने उन्हें पलकों पर बिठाकर रखा किन्तु जैसे ही भीड़ देखकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागी लोगों ने उन्हें नकार दिया। अध्यात्म के बल पर भक्तों के दिलों पर राज करने वाले संत मतदाताओं के दिल में जगह बना पाने में बिल्कुल ही फिसड्डी साबित हुए।
कई धर्मगुरुओं ने अलग अलग समय पर अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। उम्मीदवार उतारा। चुनाव लड़ाया। और फिर बियाबान में खो गये। आजादी के बाद अखिल भारतीय राम राज्य परिषद से लेकर दूरदर्शी पार्टी व अजेय भारत पार्टी तक ऐसे कई दल बने जो मतदाताओं के मन पर कोई छाप छोड़े बगैर एक-दो दशक में राजनीतिक मानचित्र से गायब हो गये। बाबाओं की बनाई अब तक की सबसे कामयाब पार्टी थी अखिल भारतीय राम राज्य परिषद। आजादी के तत्काल बाद बनी इस पार्टी के संस्थापक प्रख्यात संत स्वामी करपात्री जी महाराज थे। इस पार्टी ने 1952 के चुनाव में तीन लोकसभा सीटें और 1962 में दो लोकसभा सीटें जीतीं। कुछ राज्यों में विधान सभा सीटें भी मिलीं मगर अंत में इसका हश्र भी वही हुआ। पार्टी अखिल भारतीय जनसंघ में तिरोहित हो गई।
वैसे अभी से यह कहना जल्दबाजी होगी कि बाबा रामदेव का हश्र भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही होगा। आइए कुछ ऐसे ही बाबाओं व उनकी पार्टियों से आपको रूबरू कराते हैं।
इस श्रृंखला में सबसे पहला नाम है करपात्री जी महाराज का। उन्होंने रामराज्य परिषद नामक पार्टी बनाई। उनकी पार्टी कई चुनावों में उम्मीदवार भी उतारती रही। कुछ सीटें जीती भी। बाद में राम राज्य परिषद राजनीतिक पटल से ओझल हो गई। इसी तरह से धूमकेतु की तरह चमके बाबा जयगुरुदेव का किस्सा सबसे मजेदार है। सत्तर के दशक में पूरे उत्तर भारत में जय गुरुदेव की धूम थी। खुद तो झक सफेद मलमल से सजे रहते थे बाबा पर उनके भक्त टाट के कपड़े पहनते थे। सादा जीवन उच्च विचार पर अमल करते हुए गली-गली गांव-गांव लिखते घूमते थे जयगुरुदेव, सतयुग आएगा। उनके भक्तों का एक और प्रिय नारा था-जो अंडा, मछली खायेगा, सन् अस्सी तक मर जायेगा। खैर सन् 1980 तक सारे के सारे मांसाहारी मर गये, इसका प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। उनके समागमों में भक्तों की जुटती भीड़ देख जयगुरुदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने उड़ान भरना शुरू कर दिया। परिणाम हुआ सन् 1980 में दूरदर्शी पार्टी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में कूद पड़े। कई चुनावों में परास्त होने के बाद उनकी पार्टी अब दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। राजनीति से तौबा कर चुके बाबा अब मथुरा में रह रहे हैं।
तीसरे और महत्वपूर्ण ग्लोबल संत महेश योगी हैं। उन्होंने भी भारत अजेय पार्टी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में दो दो हाथ करने की कोशिश की। परन्तु एक बार सिर्फ एक सांसद बनाने के अलावा उनकी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई। कई चुनावों में पराजय के बाद आखिरकार अजेय भारत पार्टी भी बेमौत मर गई।
करपात्री जी का राम राज्य परिषद
देश को आजादी मिलने के बाद पहली बार 1951 में लोकसभा चुनाव हुए। इस आम चुनाव में कुल 53 दलों ने भाग लिया। इसमें एक राम राज्य परिषद भी थी। इस पार्टी की स्थापना स्वामी करपात्रीजी महाराज ने 1948 में की थी। उस चुनाव में राम राज्य परिषद पार्टी ने 61 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये जिनमें से 36 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। हालांकि तीन लोग जीत कर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे। यह तीनों सीटें पार्टी को राजस्थान में मिली। जिन लोगों ने राम राज्य परिषद के टिकट पर जीत दर्ज की। वे थे भीलवाड़ा से हरिराम, सीकर से नंदलाल तथा कोटाबूंदी से चंद्रसेन। पार्टी को इस चुनाव में कुल 20.98 लाख वोट मिले। 1952 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद ने 95 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए जिसमें केवल एक सीट हासिल हुई। इस चुनाव में उसे कुल 1.74 फीसदी वोट हासिल हुए थे। इसके बाद 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव हुए। राम राज्य परिषद ने चार राज्यों की 15 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। पर एक भी प्रत्याशी नहीं जीत सका। उल्टे 11 सीटों पर परिषद प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। मतों में भी भारी गिरावट आई। उसे इस चुनाव में सिर्फ 4.60 लाख मत मिले। 1962 में तीसरी लोकसभा के चुनाव में फिर एक बार उसने छह राज्यों की 40 लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। इनमें से 33 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी। मात्र दो सीटें- एक राजस्थान में बाड़मेर से तान सिंह तथा दूसरी एमपी में रायगढ़ से राजा विजय भूषण सिंह देव ही जीत सके। इसी के साथ पार्टी ने कुछ विधानसभा सीटों पर भी जीत हासिल की थी। बाद के चुनावों में पार्टी की भागीदारी छिटपुट रही। 1980 के चुनाव में इसने 4 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और सबकी जमानत जब्त हो गई। इसे कुल 2120 वोट ही मिले। बाद में करपात्री जी की यह पार्टी राजनीतिक नक्शे से ही गायब हो गई।
जयगुरुदेव की दूरदर्शी पार्टी
 बाबा जयगुरुदेव भी भक्तों का सैलाब देख बहक गये थे। स्वयं मलमल के झक सफेद वस्त्रों से सुसज्जित बाबा ने कलयुग जायेगा, सतयुग आयेगा के नारे के साथ अपने भक्तों को टाट पहना दिया। भक्तों की भीड़ से उत्साहित बाबा जयगुरुदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने जोर मारा और वे भी एक राजनीतिक पार्टी बना बैठे। सन् 1980 में गठित उनकी पार्टी का नाम दूरदर्शी पार्टी रखा गया। इसकी स्थापना अहमदाबाद में हुई। उनकी पार्टी का घोषणापत्र सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान के लक्ष्य पर आधारित था। उन्होंने लोकतंत्र में कम मतदान का सवाल उठाया। उनका तर्क भी दमदार था क्योंकि औसतन पचास से साठ प्रतिशत लोग ही चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। बाबा ने बाकायदा गुणाभाग करके यह भी पता लगाया कि मतदान केन्द्रों की संख्या मतदाताओं की संख्या के लिहाज से इतना कम होती है कि सारे मतदाता निर्धारित समय में वोट डाल ही नहीं पाते। बहरहाल दूरदर्शी पार्टी ने वादों का तरकश तैयार करके यूपी के विधानसभा चुनावों में अपने तीन सौ प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। पर एक भी सीट जीतना तो दूर कोई भी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया। हालांकि कुछ वोट जरूर बटोरे। दूरदर्शी पार्टी ने 1984 के आम चुनाव में  चुनाव प्रक्रिया, कराधान और प्रशासन की प्रक्रिया में बदलाव का मुद्दा उठाया। उसने दो राज्यों में  97 उम्मीदवार खड़े किये पर इनमें से एक भी प्रत्याशी की जमानत नहीं बच पाई। पार्टी को कुल पांच लाख वोट मिले जो कुल मतों का मात्र 0.2 फीसदी रहा। 1989 में इस पार्टी ने कुल 288 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें इसे कुल 0.45 प्रतिशत वोट मिले। इसी चुनाव में यूपी में इस पार्टी ने 85 में से 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। हालांकि इसे कुल पांच लाख चार हजार तीन सौ चौरासी वोटों से ही संतोष करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनाव में 321 सीटों पर लड़ी दूरदर्शी पार्टी को कुल 0.17 फीसदी ही वोट मिले। कई बार चुनाव लडऩे के बावजूद खाता खोलने में नाकाम रहने के चलते बाबा की इस पार्टी ने 1997 में चुनाव प्रक्रिया से नाता तोड़ लिया। उसी दौरान का एक वाकया है। जयगुरुदेव ने एक ऐसा नाटक किया जिससे उनकी बची खुची साख भी मिट्टी में मिल गई। दरअसल जयगुरुदेव ने ऐलान किया कि वह कानपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जनता के सामने लेकर आएंगे। मिथक बन चुके नेताजी को साक्षात देखने के लिए नियत तिथि को जनता की भारी भीड़ जुटी। लेकिन जब जयगुरुदेव सामने आए तो अकेले थे और उन्होंने खुद को ही सुभाष चंद्र बोस कह दिया। इसके बाद गुस्साई जनता ने जो उन पर जूते चप्पल बरसाये कि फिर वे इससे उबर नहीं पाये। और इस तरह मानो जयगुरुदेव की श्री ही जैसे चली गई।
महर्षि की अजेय भारत पार्टी
अस्सी के दशक में योगगुरु के रूप में चर्चित हुए महर्षि महेश योगी ने भी  अपनी एक राजनीतिक पार्टी अजेय भारत पार्टी बनाई थी। उनके भावातीत ध्यान योग ने भी उस समय बाबा रामदेव के प्राणायाम की तरह ही अपनी धूम मचाई थी। देश भर में उन्होंने योग शिक्षकों और आयुर्वेदिक चिकित्सकों का जाल भावातीत ध्यान के जरिये फैलाया था। उस समय पचास से अधिक देशों में महर्षि के 250 टीएम सेंटर खुल गये थे। यहां तक कि उन्होंने भगवान श्रीराम के नाम पर मुद्रा भी चलाया था। देश और विदेश में उन्होंने महर्षि आयुर्वेद के उत्पादों को एक भरोसेमंद ब्रांड बना डाला और जीवन के उत्तरार्ध में हालैंड में जा बसे। हालैंड से ही अचानक टीवी चैनलों के माध्यम से महर्षि महेश योगी ने देश की चुनाव पक्रिया और नेताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिये। अपने तीस लाख डालर के साम्राज्य की बदौलत वह भी साल 1992 में एक अंतरराष्ट्रीय नेचुरल लॉ पार्टी बनाकर राजनीतिक पारी खेलने के लिए मैदान में आ गये। भारत में इसकी ब्रांच थी अजेय भारत पार्टी। मगर अजेय भारत पार्टी एक चुनाव में बस एक ही उम्मीदवार को संसद तक भेज पाई। उनकी पार्टी का एजेंडा विश्व की राजनीति से कंगालों की सफाई करने का था। इसके पीछे उनका तर्क था कि समाज के संपन्न वर्ग के लोगों को ही राजनीति में आना चाहिये। गरीब नेता लोकसभा में भी पहुंच कर देश का कल्याण नहीं कर सकते। वह इसे पेशा समझ कर खाने कमाने में मशगूल हो जातेे हैं। संपन्न लोग लोकसभा, विधानसभाओं में पहुंचेंगे तो जनता को कुछ दे पाने की हैसियत में होंगे। पर अपने योग से दिलों पर राज कर रहे महेश योगी की राजनीतिक पारी बुरी तरह फ्लॉप रही। अपने अंतिम दिनों में भारत के 98 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने राजनीति के आंगन में हाथ आजमाने का प्रयास किया पर जनता ने उनके आयुर्वेद को तो दिल से अपनाया पर उनकी पार्टी का नोटिस ही नहीं लिया। 2004 में यह पार्टी अपनी मौत मर गई।
उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी
अयोध्या आंदोलन से निकली फायरबं्राड नेता उमा भारती ने भी अपनी एक अलग पार्टी बनाई थी। भारतीय जनशक्ति पार्टी। किंतु वे कुछ खास नहीं कर पाईं। यहां तक कि अपनी पार्टी के दर्जन भर उम्मीदवारों को भी नहीं जिता सकीं। थक हारकर वे फिर भाजपा में वापस लौट आईं। उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा। हालांकि यहां भी वे कोई चमत्कार नहीं दिखा पाईं।
                                                                                        बद्रीनाथ वर्मा  9718389836

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