Monday, December 7, 2015

इकॉनामी के लिए ‘रामबाण’ है जीएसटी

देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों पर प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार चुनाव में मिली भारी पराजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बात का आभास है कि संसद का शीतकालीन सत्र काफी हंगामेदार होगा। 4 सीटों से 27 सीटों पर बिहार में पहुंची कांग्रेस को इस चुनाव ने नया जीवनदान दे दिया है। ऐसे में वह मोदी सरकार की फजीहत करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखने वाली है। वह मोदी सरकार की योजनाओं को पलीता लगाने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहेगी। ऐसे में महत्वाकांक्षी जीएसटी बिल के बहाने कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार की बांह उमेठने से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चाय पर आमंत्रित कर कुशल रणनीतिकार के रूप में खुद को साबित किया है। कहा जा रहा है कि इस चाय पर चर्चा के दौरान जीएसटी बिल पर कांग्रेस ने समर्थन का भरोसा दिया लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दोबारा इसमें फच्चर फंसा दिया। वह इसमें तीन सुधार चाहते हैं। जबकि सच यह है कि अगर राहुल की बात मान ली जाए तो फिर जीएसटी के कोई मायने मतलब ही नहीं रह जाएंगे। बहरहाल, तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत अन्य कई दलों ने जीएसटी बिल को देशहित में मानते हुए अपने समर्थन का ऐलान कर दिया है। इससे सरकार को थोड़ी सी राहत मिली हुई है। गौरतलब है कि जीएसटी बिल लोकसभा से पास हो चुका है लेकिन राज्यसभा में अटका पड़ा है। चूंकि उच्च सदन में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं है इसलिए बिल को पास कराने के लिए अन्य विपक्षी दलों का सहयोग जरूरी है। वैसे आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल पुथल और मांग में गिरावट के बीच संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में वस्तु एवं सेवा कर विधेयक का पारित होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘रामबाण’ साबित हो सकता है। 
एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी के लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार में लगभग दो प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अगर सरकार बुनियादी ढांचे पर जोर देना जारी रखती है तो वर्ष 2018-19 तक यह आंकड़ा नौ प्रतिशत तक पहुंच सकता है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि अगले दो तीन सालों में जीडीपी दो अंकों में पहुंच जाएगी। यह सौ प्रतिशत सही है कि जीएटी के लागू होने से केंद्र तथा राज्य के कुल राजस्व में भी भारी इजाफा होगा। बावजूद इसके राजनीतिक गुणा भाग के तहत जीएसटी पर सियासत हो रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी विधेयक के पारित होने से सरकार विदेशी निवेशकों को यह संदेश देने में कामयाब होगी कि आर्थिक सुधारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता बनी हुई है और ये उसकी प्राथमिकता में हैं तथा वह घरेलू स्तर पर आर्थिक चुनौतियों से निपट सकती है। 
संसद के पिछले सत्र में कोई विधायी कामकाज नहीं होने के कारण सदन का काम सुचारु रूप से चलाने का जिम्मा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद संभाला है। इसके लिए वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले है और विपक्षी नेताओं के साथ मेलजोल बढ़ा रहे हैं। जीएसटी लोकसभा में पारित हो चुका है जबकि विपक्ष के विरोध के कारण राज्यसभा में लंबित है। विश्लेषकों के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जीएसटी को पारित करने का यह सही समय है और देश की आर्थिक स्थिति इसमें देर करने की हालत में नहीं है। पेरिस आतंकवादी हमले के बाद विश्व की राजनीतिक स्थिति भी बदल रही है। इस हमले और इसके बाद की घटनाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंद किया है। यूरोप, चीन और जापान में पहले ही मंदी का दौर चल रहा है। इसका असर देर सबेर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। ऐसे में जरूरी है कि सियासत को एक किनारे रखकर देशहित में इस बिल को सभी दल मिलकर पारित करायें। राजनीति करने के लिए बहुत सारा समय शेष है। जीएसटी के लागू होने से कर संग्रहण की जटिलताएं दूर होगीं और अप्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाया जा सकेगा। इससे उत्पादन की लागत में कमी आएगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा जिससे उनकी क्रय क्षमता बढ़ेगी। मुद्रास्फीति में भी कमी आएगी। जीएसटी को पारित करने में राजनीतिक दलों की एकजुटता से घरेलू और विदेशी निवेशकों में सकारात्मक संदेश जाएगा जिसकी अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए सख्त जरूरत है। जानकारों का कहना है कि जीएसटी को पारित करने के लिए सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने मतभेद दूर करने चाहिए। सरकार को अपनी ओर से इनकी समस्याओं का निराकरण करते हुए बीच का रास्ता निकालना चाहिए। 
फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। सरकार के कई प्रयासों के बावजूद देश में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है। देश के उद्योगों की धड़कन माने जाने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सितंबर में चार महीने के न्यूनतम स्तर 3.6 प्रतिशत पर आ गया है। लगातार दो सालों से मानसून के कमजोर होने से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घट रही है। इससे कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में मांग प्रभावित हो रही है। खाद्य पदार्थों की उच्च मुद्रास्फीति से भी सेवा क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र की मांग घट रही है। समय आ गया है कि देशहित पर सियासत को तवज्जो देने की परिपाटी बंद हो। सिर्फ एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए या फिर श्रेय किसी दूसरे को मिल रहा है इस कारण से किसी बिल को पारित न होने देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। सियासत में विरोध जायज है लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध हो यह किसी भी तरह से उचित नहीं है।

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