देश के कई नामचीन अखबारों व वेबसाइटों में प्रकाशित
बद्रीनाथ वर्मा
बिहार के मतदाताओं ने जदयू, राजद और कांग्रेस के पक्ष में अपना जनादेश दे दिया। यह जनादेश करीब 19 माह पहले हुए लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलहदा साबित हुआ। कुछ महीनों के भीतर आये इस फैसले में कई संदेश छुपे हुए हैं। ये संदेश बिहार की राजनीति से लेकर केंद्रीय राजनीति से सरोकार रखने वाले हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भारत में एक नये राजनीतिक व्याकरण की रचना की है। तमाम आकलन और अनुमानों को धत्ता बताते हुए नीतीश कुमार नीत महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) ने चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले राजग को करारी शिकस्त दी है। एनडीए द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा प्रस्तुत नहीं करना, बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेताओं के मोदी विरोधी सुर, मोहन भागवत का आरक्षण वाला बयान, महंगाई की मार, गाय व बीफ की राजनीति जैसी अन्य कई बातें भाजपा को ले डूबी। भाजपा के लिए यह न भूलने वाला चुनाव होगा। 243 सदस्यीय सदन में 178 सीटें जीतकर महागठबंधन ने जहां अपना किला मजबूत किया, वहीं अपना सब कुछ दांव पर लगाकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ सिर्फ 58 सीटें लगीं। लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 31 सीटें जीतने वाले भाजपा गठबंधन को विधानसभा चुनाव में ‘महा-हार’ का सामना करना पड़ा। वहीं, लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों करारी शिकस्त का मलाल धोते हुए महागठबंधन ने आंखें चौंधिया देने वाला प्रदर्शन किया। समझा जा रहा है कि बिहार में आए चुनाव परिणामों से दिल्ली की राजनीति में भी व्यापक असर देखने को मिलेगा। जैसा कि लालू प्रसाद यादव ने कहा भी है कि नीतीश बिहार देखेंगे और वे देश। बेशक राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश व लालू का कद बढ़ेगा।
भाजपा को सबसे तगड़ा झटका उसके सहयोगियों की तरफ से मिला, जो 87 सीटों पर चुनाव लड़े और केवल पांच पर जीत दर्ज कर सके। भाजपा को उम्मीद थी कि वह राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा के जरिये दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वोटों में सेंध लगा पायेगी लेकिन ऐसा हो न सका। पासवान और आरएलएसपी को जहां दो-दो सीटें नसीब हुईं वहीं मांझी की पार्टी को तो सिर्फ एक ही जीत से संतोष करना पड़ा। पिछले वर्ष मई में लोकसभा चुनाव में प्रचंड वेग के साथ अपनी पार्टी का विजयरथ हांकने वाले मोदी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर में अकेले या गठबंधन सरकार बनाई। इस बात को ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस, राजद और जदयू का सूपड़ा साफ करके राज्य की 40 में से 31 सीटें जीती थीं। इस जीत ने राजनीति के एक कुटिल सिद्धांत कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, को सतह पर ला दिया और इन तीनों पराजित योद्धाओं ने मोदी के खिलाफ कमर कस ली। एक महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में तीनों दलों ने थोड़े संकोच के साथ हाथ मिलाया, लेकिन 10 में से 6 सीटों पर जीत ने तीनों पार्टियों को एक होने का हौंसला दिया और उसी का नतीजा था कि मोदी के सामने लोकसभा चुनाव में पिद्दी साबित हुई पार्टियां मोदी को ही बौना करने में कामयाब रहीं।
इस महाविजय के साथ बिहार की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने फिर से अपनी रणनीति का लोहा मनवा दिया है और भारी जीत दर्ज कर वह एक बार फिर से प्रदेश के चंद्रगुप्त बनने जा रहे हैं। नीतीश की यह लगातार तीसरी जीत है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इस सदियों पुरानी कहावत का अनुसरण करते हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की 40 सीटों में से मात्र दो सीटों पर जीत हासिल करने के बाद जनता दल यू नेता नीतीश कुमार ने अपने कट्टर दुश्मन नरेंद्र मोदी रूपी तूफान को रोकने के लिए लालू से गलबहियां डालीं। राज्य की राजनीति में दोस्त से दुश्मन और फिर दोस्त बने लालू और नीतीश ने अपने अपने मतभेदों को भूलाकर 40 साल पुराने छात्र आंदोलन के जमाने के गठबंधन को फिर से खड़ा किया। इसी छात्र आंदोलन की सीढ़ी पर चढ़कर 1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कूदे लालू की किस्मत रंग लायी और वह चुनाव जीत गए। लेकिन उनके साथी नीतीश कुमार को 1985 में राज्य विधानसभा चुनाव में पहली बार जीत हासिल करने में आठ साल लग गए। 1985 से पहले नीतीश दो बार चुनाव हार गए थे। नीतीश कुमार ने 1989 में बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए लालू का समर्थन किया। बारा से 1989 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले नीतीश कुमार ने अपनी नजरें राज्य की राजनीति से हटाकर अब दिल्ली पर केंद्रित कर दी थीं और वह 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में भी विजयी रहे। नीतीश ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री और 1999 में कुछ समय के लिए रेल मंत्री का पदभार संभाला। सौम्य नीतीश कुमार वर्ष 2001 में फिर से रेल मंत्री बने और 2004 तक इस पद की कमान संभाली। रेल भवन में उनके आसीन रहने के दौरान ही फरवरी 2002 में गोधरा ट्रेन कांड हुआ, जिसने जल्द ही गुजरात को सांप्रदायिक आग के लपेटे में ले लिया। दिल्ली में सत्ता के गलियारों में नीतीश अपने राजनीतिक और प्रशासनिक कौशल को मांजने में लगे रहे और इस कारण वह लालू से दूर होते चले गए।
बहरहाल, बिहार विजय के बाद भाजपा की खिलाफत वाली राजनीति के केंद्र में इनकी अहमियत भी बढ़ेगी। इस लिहाज से कहा जाये तो बिहार के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगह थी। अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद उत्तर प्रदेश की बारी है। महागंठबंधन को मिला विजय चौंका देने वाला है। उसकी जीत का आंकड़ा 178 तक पहुंच गया। जिस तरह से बिहार के इस चुनाव में केंद्र सरकार ने अपनी ऊर्जा खर्च की, ऐसा उदाहरण राज्यों के चुनाव में प्राय: नहीं देखा गया है। इस पूरे अभियान का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर किया। उनकी मदद अमित शाह और भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं ने की। इसकी तुलना में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी ने इसका जवाब 1990 के दशक के सामाजिक न्याय के मुद्दे को फिर से उठाकर दिया। जब बिहार में चुनाव की घोषणा हुई थी, तब महागंठबंधन व्यवस्थित नहीं था। बहरहाल, केन्द्र सरकार की भारी भरकम रणनीति के सामने क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी कौशल भारी रहा। कुल मिलाकर नीतीश का यह नारा कामयाब रहा-बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है।
No comments:
Post a Comment