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बद्रीनाथ वर्मा
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह क्या दी, मानो सियासी गलियारों में तूफान आ गया। बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख के आए इस बयान ने जहां भाजपा के हाथ पांव फूला दिये वहीं विपक्षी दलों को बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया। हालांकि संघ की विचारधारा को समाज व देश को बांटने वाला बताने वाली कांग्रेस की तरफ से आश्चर्यजनक तरीके से इस मुद्दे पर समर्थन दिखा। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि गरीबी सबसे बड़ा पिछड़ापन है। अब समय आ गया है कि इसपर बात की जाए कि इस 21वीं सदी में आरक्षण प्रासंगिक है या नहीं। अगर हां, तो आरक्षण का क्या आधार होना चाहिए। सबसे बेहतर तो ये रहेगा कि जाति, समुदाय और धर्म से ऊपर उठकर आरक्षण का आधार आर्थिक किया जाए। बहरहाल, लालू से लेकर मायावती तक और जदयू से लेकर माले तक सभी के सभी दाना पानी लेकर भाजपा व संघ पर चढ़ दौड़े हैं। जंगलराज का तोहमत झेल रहे ये वही लालू प्रसाद यादव हैं जिनके कभी घनिष्ठ सहयोगी रहे रामकृपाल यादव और पप्पू यादव उन पर सामाजिक न्याय की आड़ में परिवारवाद का पोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं। मोहन भागवत ने संघ के मुखपत्र में केवल आरक्षण की जरूरतों व समयसीमा को लेकर समीक्षा करने की बात कही थी। उनका यह कहना आरक्षण को अपनी राजनीतिक बैसाखी बना चुके इन दलों को गवारा नहीं हुआ। लालू प्रसाद ने सबसे तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने संघ प्रमुख पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो आरक्षण समाप्त कर के दिखाओ। आरक्षण पर राजनीति और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए संघ प्रमुख ने सुझाव दिया था कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को और कितने दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ऐसी समिति में राजनीतिकों से ज्यादा 'सेवाभावियों' का महत्व होना चाहिए। गुजरात में पाटीदार और राजस्थान में गुर्जर सहित कई क्षेत्रों में कई जातियों को आरक्षण देने की बढ़ती मांगों की पृष्ठभूमि में सरसंघचालक का यह बयान बर्र के छत्ते में हाथ डालने वाला साबित हुआ। 'फेसबुक' के अपने वॉल पर तथा ट्वीट कर लालू ने भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए लिखा, मैं डरपोक भाजपाइयों को चैलेंज देता हूं कि तुम आरक्षण खत्म करने को कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पिया है तो खत्म करके दिखाओ। किसकी कितनी ताकत है, पता चल जाएगा। बिहार में जारी चुनावी घमासान के आलोक में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने आगे लिखा ‘लालू नली-गली में मिट जाएगा परंतु मुट्ठीभर अभिजात्यों का एजेंडा बहुसंख्यक बहुजनों पर लागू नहीं होने देगा।’ लालू यहीं नहीं रुके उन्होंने ट्वीट किया, आरएसएस व भाजपा आरक्षण खत्म करने के लिए कितना भी सुनियोजित माहौल बना ले, देश के 80 प्रतिशत दलित व पिछड़ा इनका मुंहतोड़ करारा जवाब देगा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल करते हुए लिखा, ‘लोकसभा चुनाव में खुद को पिछड़ा बता कर वोट ठगने वाला, तथाकथित चाय बेचने वाला, हाल ही पिछड़ा बने नरेंद्र मोदी बताएं कि वो अपने 'आका' के कहने पर आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं?’ जनता दल यू ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इसे पिछड़ों और वंचितों को कमजोर करने का प्रयास करार देते हुए जदयू के प्रवक्ता के सी त्यागी ने कहा कि मौजूदा आरक्षण नीति में किसी प्रकार की छेड़छाड़ संविधान के खिलाफ है। आरक्षण अभी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है और इस स्थिति में आरक्षण नीति की समीक्षा से निश्चित रूप से पिछड़े एवं कमजोर वर्गों का अहित होगा। उधर मायावती ने भी आरक्षण को संवैधानिक व्यवस्था बताते हुए धमकी दे दी कि अगर इसको हटाने की बात की गई तो देश भर में आंदोलन किया जाएगा। आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार किए जाने के भागवत के सुझाव की विपक्ष द्वारा तीखी आलोचना किए जाने के बीच केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा किए जाने के पक्ष में नहीं है। कैबिनेट की बैठक के बाद केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार और भाजपा दोनों का मत है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता नहीं है। हमारा विश्वास है कि आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक प्रगति के लिए यह आवश्यक है। हालांकि माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य की नजर में भाजपा की असहमति दिखावा है। उनका मानना है कि इसके जरिए भाजपा भ्रम पैदा करने की कोशिशें कर रही है लेकिन बिहार और पूरे देश की जनता संघ परिवार की सामंती-सांप्रदायिक पक्षधरता और दलित-गरीब-पिछड़ा विरोधी रुख से परिचित है। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने भागवत के बयान से सहमति जताते हुए तर्क दिया कि आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट आखें खोलने वाली है क्योंकि इस रिपोर्ट के अनुसार 83 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा 87 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोगों की मासिक आय एक हजार रुपये से भी कम है। तथ्य है कि आरक्षण का लाभ पांच प्रतिशत से भी कम लोगों को मिला है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आजादी के इतने वर्षों तक आरक्षण जारी रहने के बाद भी उसका लाभ कहां चला गया। उत्तर सरल है कि इन जातियों के सम्पन्न लोगों ने ही इसका लाभ उठाया। एक बार मांग उठी थी कि इन वर्गों के सम्पन्न लोगों को आरक्षण का लाभ न दिया जाए। सुझाव उचित तथा महत्वपूर्ण था पर सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया। विभिन्न पार्टियों के कई नेता इसी संपन्न तबके से आते हैं।
अब सवाल यह है कि भागवत का यह बयान अनायास ही है या फिर सोची समझी रणनीति के तहत। इस संदर्भ में यहां एक बात का जिक्र करना जरूरी लगता है। लोकसभा चुनाव से पहले मेरी मुलाकात संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी से हुई। उस दौरान मैंने संघ और भाजपा के सबंधों को समझने के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को लेकर उनसे एक प्रश्न पूछा था। प्रश्न का उत्तर देने से पहले उन्होंने जो एक बात कही वह यह कि पूर्व संघ प्रमुख सुदर्शन जी की तरह भागवत जी की जुबान फिसलती नहीं है। मै यह चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि अभी आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख का बयान आया है। अगर जुबान न फिसलने वाली बात सही है तो फिर बिहार विधान सभा चुनाव की पूर्व बेला पर यह बयान अपने पीछे कई सवाल छोड़े जा रहा है।
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